राशियों के प्रधान देवता से सबंधित इन मंत्रों के जप से शुभ फल मिलता है। जब-जब आप पर कोई संकट मंडरा रहा हो, तो नीचे लिखे मंत्रों का जप जरूर करें। इन मंत्रों से जीवन में सफलता प्राप्त होने के साथ ही आपका आत्मबल बढ़ेगा।
मेष: मेष राशि वालों के लिए हनुमानजी की आराधना सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली होती है। इन लोगों को इस मंत्र का जप करना चाहिए। मंत्र: ऊं हुं श्री मंगलाय नम:।
वृष: शुक्र की आराधना वृष राशि वालों में जादुई आकर्षण उत्पन्न कर सकती है। मंत्र: ऊँ ह्री श्रीं शुक्राय नम:।
मिथुन: आपकी राशि की प्रधान देवी लक्ष्मी का पूजन कर इस मंत्र का जाप करें। मंत्र: ऊं ऐं स्त्री श्रीं बुधाय नम:।
कर्क: आपकी राशि के प्रधान देवता शंकर के इस मंत्र के जाप से आपकी हर मनोकामना पूर्ण होगी। मंत्र: ऊं श्रीं क्रीं चं चंद्राय नम:। 
सिंह: आपकी राशि के प्रधान देवता सूर्य है। आप रोज उगते सूरज के दर्शन करें और नीचे लिखे मंत्र का जप करें। मंत्र: ऊं ह्रीं ह्रीं सूर्याय नम:।
कन्या: आपके प्रधान देवता श्री कृष्ण है। भगवान श्री कृष्ण को बेसन के हलवे का भोग लगाएं और नीचे लिखे मंत्र का जप करों। मंत्र: ऊं ह्री पीताम्बरा परमाले नम:।
धनु: आपके प्रधान देवता विष्णु है। आप विष्णु की उपासना के इस मंत्र का जप कर जीवन हर सुख की प्राप्ति होगी। मंत्र: ऊं बृं बृहस्पते नम:।
मकर: मकर राशि वालों को गोपालजी की पूजा करनी चाहिए। गाय को हरा चारा खिलाएं और नीचे लिखे मंत्र का जप करें। मंत्र: ऊं ह्रीं ह्रीं की धरणी धराय नम:।
कुंभ: आपके इष्ट कुबेर है। नित्य कुबेर की उपासना इस मंत्र के साथ करें। आप अपना जीवन सुख-सुविधा और धन से सम्पन्न बना सकते हैं। मंत्र: ऊं ऐं ह्र्रीं ह्रीं श्री शनैश्चराय नम:
मीन: मीन राशि वालों को मां जगदम्बा की आराधना करना चाहिये। नीचे लिखे मंत्र के जप से आपको सर्व सिद्धि मिलेगी। मंत्र: ऊं ऐं क्लीं बृहस्पते नम:।

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आखिर कितने वैब - मैसेंजर इंस्टाल करें ?

आजकल इंटरनेट प्रयोग करने वाले तकरीबन सभी प्रयोक्ता किसी न किसी मैसेंजर का प्रयोग अवश्य करते हैं, जैसे याहू मैसेंजर, रैडिफबोल, एम.एस.एन. मैसेंजर, जी-टॉक आदि । लेकिन ये आवश्यक नहीं कि हमारे सभी कोंटेक्ट लिस्ट किसी एक ही तरह की मेल आई डी वाले हो, कोई ज़ीमेल पर हैं तो कोई अन्य आई डी पर । लेकिन हम सभी तरह के मैसेंजर तो इंस्टाल करके तो नहीं रख सकते ।
यहां कुछ लिंक देने की कोशिश कर रहा हूं , जिससे हमे किसी भी मैसेंजर को अपने कम्प्यूटर पर रखने की आवश्यकता नहीं हैं ।

1. जीमेल के जी-टॉक के लिये :- ऑनलाईन जी-टॉक मैसेंजर के लिये यहां चटका लगायें ।


2. याहू के याहू मैसेंजर के लिये :- ऑनलाईन याहू मैसेंजर के लिये यहां चटका लगायें ।


3. माइक्रोसॉफ्ट के एम.एस.एन. मैसेंजर के लिये :- ऑनलाईन मैसेंजर के लिये यहां चटका लगायें ।


इन ऑनलाईन मैसेंजर के प्रयोग से हमें तीन मैसेंजर के इंस्टालेशन से छुटकारा तो मिल जायेगा लेकिन अब हमें अलग-अलग तीन बार तो लॉगिन करना पडेगा ।

लेकिन इस समस्या से भी छुटकारा पाया जा सकता हैं , इसके लिये इस लिंक का प्रयोग़ किया सकता हैं 

हिन्दी में टाईप

हिन्दी में टाईप करने के अनेक टूल एक साथ उपलब्ध करवाने के लिये सर्वज्ञ को बहुत बहुत धन्यवाद । यहां मुझे ऑनलाईन ओर ऑफलाईन दोनों तरह के टूल उपलब्ध हो गये । मुझेबरहा ओर हिन्दी IME अधिक उपयोगी लगे ।

सर्वज्ञ को एक बार ओर घन्यवाद ।

मैं कम्प्यूटर पर हिन्दी नही लिख पा रहा था ओर हिन्दी के लेख भी ठंग से नही पठ पा रहा था । फिर मुझें एक ऐसे प्रोग्राम का लिंक जिससे मेरे कम्प्यूटर पर हिन्दी सम्बन्धी सभी सैटिंग स्वतः ही हो गयी ।

 प्रोग्राम बनाने वाले को मेरा धन्यवाद ।

 

आप कितने साल की उम्र तक जिन्दा रहेंगे ?

आप की उम्र क्या हैं ? इस सवाल का जबाब तो सभी दे सकते हैं । परंतु आप कितने साल तक जिन्दा रहोगे ? इस यक्ष प्रश्न का उत्तर तो बडा ही कठिन हैं । परंतु अमेरिका के कुछ आयु अध्ययन कर्ताओं (Geronotologist) ने इस प्रश्न का हल निकालने के लिये कुछ मेहनत की हैं जिसे उन्होने मौत का भविष्य का नाम दिया हैं । ये सत्य के कितने करीब हैं, बताना कठीन हैं परंतु हैं मजेदार । और हां गलत उत्तर नहीं देने हैं, क्योंकि ये केवल अनुमान हैं ।

 

(वेदों सेः 
वेद और पुराण हिंदू धर्म की अमूल्य निधि हैं। जन्म से मृत्यु तक के हमारे संस्कार इन्हीं वेदों और पुराणों की परंपरा पर आधारित हैं। पुराणों की संख्या अठ्ठारह कही गई है। इनमें विभिन्न व्यक्तियों, वस्तुओं, जीवों आदि को आधार बनाकर शिक्षा और ज्ञान का महत्व बताया गया है। कहानियों-कथाओं के जरिए सही और गलत में अंतर बताया गया है। पुराण ज्ञान और शिक्षा के साथ मनोरंजन का भी भरपूर खजाना है। यही कारण है कि लोग इसे आज के समय में भी पढ़ना पसंद करते हैं।)

(वेद हिंदू धर्म का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। वेद के तीन भाग हैं- उपनिषद भाग, मंत्र भाग और ब्राह्मण भाग। उपनिषद वेद का ज्ञान वाला भाग है। उपनिषद कुल 10 हैं। उपनिषद का अर्थ बहुत व्यापक है। उपनिषदों की रचना वेदों के अंत में की गई है। इसीलिए इन्हें वेदांत भी कहते हैं। इनमें गुरु-शिष्य के प्रश्नोत्तर के जरिए सृष्टि के गूढ़ रहस्यों के बारे में चर्चा की गई है। सत्य की खोज की उत्सुकता इनका मुख्य विषय है।)

वैवस्वत मनु कथा

भगवान सूर्य का विवाह विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से हुआ। विवाह के बाद संज्ञा ने वैवस्वत और यम (यमराज) नामक दो पुत्रों और यमुना (नदी) नामक एक पुत्री को जन्म दिया। 

संज्ञा बड़े कोमल स्वभाव की थी, जबकि सूर्यदेव प्रचंड तेजवान थे। संज्ञा सूर्यदेव के तेज को बड़े कष्ट से सहन कर पाती थी। उसके लिए वह तेज असहनीय था। तब उनके तेज से बचने के लिए वह अपनी छाया को उनकी सेवा में छोड़कर स्वयं पिता विश्वकर्मा के पास चली गई। 

वहाँ रहते हुए अनेक दिन हो गए, तब विश्वकर्मा ने उसे पति के घर लौटने को कहा। वह सूर्यदेव के तेज से भयभीत थी और उनका सामना नहीं करना चाहती थी। इसलिए उत्तरकुरु नामक स्थान पर घोड़ी का रूप बनाकर तपस्या करने लगी।

इधर सूर्यदेव और संज्ञा की संतानें छाया को ही संज्ञा समझते थे। एक दिन छाया ने किसी बात से क्रोधित होकर यम को शाप दे दिया। शाप से भयभीत होकर यम पिता सूर्य की शरण में गए और उन्हें माता द्वारा शाप देने की बात बताई। 

‘माता ने अपने पुत्र को शाप दे दिया’-यह सुनकर सूर्य को छाया पर संदेह हो गया। उन्होंने छाया को बुलवाया और उससे संज्ञा के विषय में पूछने लगे। छाया के चुप रहने पर वे उसे शाप देने को तैयार हो गए। तब भयभीत छाया ने सबकुछ सच-सच बता दिया। सूर्यदेव ने उसी क्षण समाधि लगाकर देखा कि संज्ञा उत्तरकुरु नामक स्थान पर घोड़ी का रूप धारण कर उनके तेज को सौम्य और शुभ करने के उद्देश्य से कठोर तपस्या कर रही है।

तब सूर्यदेव ने अपने श्वसुर विश्वकर्मा के पास जाकर उनसे अपना तेज कम करने की प्रार्थना की। विश्वकर्मा ने उनके तेज को कम कर दिया। सूर्य के ऋग्वेदमय तेज से पृथ्वी, सामवेदमय तेज से स्वर्ग और यजुर्वेदमय तेज से पाताल की रचना हुई। सूर्यदेव के तेज के सोलह भाग थे। 

विश्वकर्मा ने इनमें से पन्द्रह भाग कम कर दिए और उनसे भगवान शिव का त्रिशूल, विष्णु का चक्र, वसुआक नामक भयंकर शंकु, अग्निदेव की शक्ति, कुबेर की पालकी तथा अन्य देवगण के लिए अस्त्र-शस्त्रों की रचना की। तभी से सूर्यदेव अपने तेज के सोलहवें भाग से ही चमकते हैं।

तेज कम होने के बाद सूर्यदेव घोड़े का रूप बनाकर संज्ञा के पास गए और वहीं उसके साथ संसर्ग किया। इससे उन्हें नासत्य, दस्त्र और रेवंत नामक पुत्रों की प्राप्ति हुई। नासत्य और दस्त्र अश्विनीकुमार के नाम से प्रसिद्ध हुए। तत्पश्चात सूर्य ने प्रसन्न होकर संज्ञा से वर माँगने को कहा।

संज्ञा ने अपने पुत्र वैवस्वत के लिए मनु पद, यम के लिए शाप मुक्ति और यमुना के लिए नदी के रूप में प्रसिद्ध होना माँगा। भगवान सूर्यदेव ने इच्छित वर प्रदान किए और उसे साथ लेकर अपने लोक में लौट गए।

वैवस्वत सातवें मन्वंतर का स्वामी बनकर मनु पद पर आसीन हुआ। इस मन्वंतर में ऊर्जस्वी नामक इन्द्र थे। अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, भरद्वाज, विश्वमित्र और जमदग्नि- ये सातों इस मन्वंतर के सप्तर्षि थे। इस मन्वंतर में भगवान विष्णु ने महर्षि कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से वामन नाम से अवतार लेकर तीनों लोकों को दैत्यराज बलि के अधिकार से मुक्त किया।

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गंगा का पृथ्वी पर आगमन

प्राचीन काल में राजा सगर नामक प्रतापी राजा हुआ करते थे। उनके साठ हजार पुत्र थे। एक बार राजा सगर के मन में अश्वमेध यज्ञ करने का विचार उत्पन्न हुआ। उन्होंने अपने मंत्रियों को यज्ञ की तैयारी करने का आदेश दे दिया। शुभ मुहूर्त पर यज्ञ आरम्भ हुआ। यज्ञ-अश्व को छोड़ा गया।

देवराज इन्द्र ने सोचा कि अश्वमेध यज्ञ करके राजा सगर कहीं उनका राजसिंहासन न हथिया ले। अतः उन्होंने दैत्य का रूप धारण कर यज्ञ अश्व को चुरा लिया और भगवान विष्णु के अंशावतार कपिल मुनि के आश्रम में छुपा दिया। अश्व का हरण होने पर ऋषि-मुनियों ने सगर से अतिशीघ्र यज्ञ-अश्व ढूँढने के लिए कहा।

राजा सगर ने अपने साठ हज़ार पुत्रों को यज्ञ का अश्व खोजने के लिए भेजा। उन्होंने सारी पृथ्वी छान डाली, किंतु उन्हें यज्ञ का अश्व कहीं भी दिखाई नहीं दिया। सगर-पुत्र भूमि खोदते हुए महर्षि कपिल के आश्रम के निकट पहुँच गए। वहाँ उन्हें यज्ञ का अश्व बँधा हुआ दिखाई दिया।

उन्होंने सोचा कि यज्ञ में विघ्न डालने के लिए कपिल मुनि ने ही यज्ञ-अश्व का हरण किया, अतः उन्होंने भगवान विष्णु अंशावतार महर्षि कपिल को अपशब्द कह दिए। तब मुनि ने क्रुद्ध होकर उन्हें भस्म कर डाला।

यह समाचार सुनकर सगर शोक में डूब गए। तब उनके पौत्र अंशुमान ने महर्षि कपिल की स्तुति कर उनका क्रोध शांत किया। महर्षि कपिल ने प्रसन्न होकर यज्ञ अश्व लौटा दिया। महर्षि को प्रसन्न देखकर अंशुमान ने उनसे मृत सगर-पुत्रों के उद्धार के विषय में पूछा। उन्होंने कहा कि गंगा की पवित्र जलधारा ही सगर-पुत्रों का उद्धार कर सकती है।

महर्षि कपिल के परामर्श के अनुसार राजा सगर गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तप करने लगे। उनकी मृत्यु के बाद अंशुमान ने और इसके बाद उनके पुत्र दिलीप ने अनेक वर्षों तक कठोर तप किया। किंतु वे गंगा को पृथ्वी पर लाने में सफल नहीं हुए। अंत में अंशुमान के पौत्र भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए। 

भगवान के दर्शन पाकर भगीरथ श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति करने लगे। तब भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर भगीरथ से कहा-“वत्स! तुम्हारी कठोर तपस्या से मैं अति प्रसन्न हूँ। तुम्हारी अभिलाषा पूरी करने के लिए ही मैं यहाँ प्रकट हुआ हूँ। तुम निःसंकोच इच्छित वर माँग लो।”

भगवन! गंगा माता को पृथ्वी पर लाने के लिए मेरे परदादा राजा सगर, दादा अंशुमान और पिता दिलीप ने अनेक वर्षों तक कठोर तपस्या की। किंतु वे इसमें सफल नहीं हुए और तपस्या करते हुए उन्होंने प्राण त्याग दिए। तब मैंने उनके कार्य को सम्पन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। प्रभु! यदि आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो गंगा देवी को पृथ्वी पर भेजने की कृपा करें।”

उसकी बात सुनकर भगवान विष्णु ने देवी गंगा से कहा-“गंगे! तुम अभी नदी के रूप में पृथ्वी पर जाओ और सगर के सभी पुत्रों का उद्धार करो। तुम्हारे स्पर्श से वे सभी राजकुमार मेरे परम धाम को प्राप्त होंगे।

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भारतीय वेद और पुराण

भारत देश को सनातन धर्म वाला देश कहा जाता रहा है । यहां पर पुरातन काल में चार वेद ओरअट्ठारह पुराण लिखे गये थे । जिनमें लिखी गयी बातें ओर कथन आज के युग में भी उतनी ही प्रासंगिक है । मैनें यहां पर चारों वेद ओर सभी पुराणों का संकलन देख़ा । आप भी पठिये यासुनियें ।

भारतीय वेदों को जाल पर लाने वालों को हार्दिक धन्यवाद ।

 
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