सत्य नारायण कथा: 

किसी समय का वृतान्त है । क्षीरसागर में भगवान नारायण के दर्शन की अभिलाषा से तीनों लोगों में विचरने 

वाले महषिZ नारद मुनि का आगमन हुआ। उन्होने देखा क्षीरसागर में श्यामवर्ण और चार भुजाओं वाले देवों 

के देव भगवान नारायण,जिनके सिर पर मुकुट,हाथों में शंख,चक्र,गदा और पù है। जो गले में कौस्तुभमणि 

पहने हुए है। जिनके वक्ष पर भ्रगु के चरणों का चिन्ह अंकित है। जो शेषशैय्या पर विराजमान है। जिनके 

नाभिकमल पर ब्रह्माजी ध्यानमुद्रा में बैठे है। देवी भगवती लक्ष्मी उनके श्रीचरणों में उपस्थित सेवा मग्न है।

जिनके श्रीचरणों से गंगा निरन्तर प्रवाहित हो रही है। ब्रह्मा,वरूण,इन्द्र,रूद्र और मरूद्गण दिव्य स्तेत्रों से जिनकी

 स्तुति कर रहे हैं। महषिZ नारद ने नतमस्तक होकर उनको प्रणाम किया।अपने मानस पुत्र को आया देख 

भगवान नारायण ने भी उनका अभिवादन किया। भगवान नारायण ने अपने मानस पुत्र नारद को दुखित देखा।

देखा कि नारद बहुत ही चिन्तित मुद्रा है। उन्हें चिन्तायुक्त देख परमशक्तिशाली भगवान नारायण ने उनसे 

उनकी चिन्ता का कारण पूछा-

            “वत्स!तुम बहुत चिन्तित दिखाई दे रहे हो। तुम्हारे इस चिन्ता का कारण क्या हैर्षोर्षो`    

“ हे परमपिता भगवन!आप अत्यन्त शक्ति सम्पन्न है। मन  तथा वाणी भी आपको नहीं पा सकते। 

आपका आदि मध्य और अन्त दिखाई नहीं देता। आप निर्गुण स्वरूप सृष्टि के कारण भक्तों के दु:खों को नष्ट 

करनेवाले हो फिर भी मृत्युलोक में मनुष्य असह्य दु:ख भोग रहे हैं।“महषिZ नारद कातर होकर बोले।

  “ मैं तुम्हारा मंतव्य समझ नहीं पा रहा हूंं वत्स! तुम्हारा किस कार्य के लिए क्षीरसागर में 

आगमन हुआ हैै। नि:संकोच कहिए।“ भगवान नारायण ने आश्वस्त करते हुए कहा“   “पिताश्री! मुत्युलोक में प्राणी अनेक योनियों में पैदा हुए हैै। इतना ही नहीं इस घोर कलियुग 

में अज्ञानी-मूढ़ और भक्ति रहित मनुष्यों की गति बहुत ही चिन्तनीय हो गई है। मनुष्य छल,कपट,भ्रष्टाचार-व्यभिचार में लिप्त है। उन्हें कही भी शान्ति का मार्ग दिखाई नहीं दे रहा है। चारों ओर  

अशान्ति छाई हुई है। दुबुZद्धि मनुष्य अहंकारी हो गए है। साधुजन नि:सहाय हो गए है। वे सब के सब इतने लम्पट और दुराचारी हो गए है कि उन्होने मानवीयता की हदें पार कर दी है। 

अब वे शान्ति और सुख की तलाश में भटक रहे है।उन वेद-विद्यारहित मनुष्यों को परमशान्ति किस प्रकार मिल सकेगी तथा उनका कल्याण कैसे होगार्षोर्षोहे भगवन्! कोई ऐसा साधन

 बताइए जिसके साधने से या करने से कम समय मेें मनोवांछित फल प्राप्त हो सकें। हम आपके बताए मार्ग को अपनाने के लिए मनुष्यों को पे्ररित करेंगे।“

  “ हे प्रिय वत्स! मनुष्यों के कल्याण हेतु तुमने बहुत उत्तम विचार किया है। हमें यह जानकर प्रसन्नता हुई कि तुम मनुष्य मात्र के हितचिन्तक तो हो ही उनके कल्याण के लिए भी 

चिन्तित हो।“   इतना कहकर भगवान नारायण बहुत गंभीर हो गए। कुछ क्षण तक वे मौन रहे,उसके बाद बोले-

           “ मृत्युलोक के मनुष्यों के कल्याण के लिए मैं कोई अच्छा सा उपाय बताऊँगा। जिसके करने से दु:खों से छुटकारा मिल जाता है।यह साधन बहुत कल्याणकारी और 

जनहितकारी है। तुमने मानव कल्याण के लिए साधन जानना चाहा है। मैं इसे अवश्य ही तुमसे कहता हूँ। हे पुत्र! तुम इस साधन का विधि विधान मनुष्यों को बताओ।जिसे करने से

 उनका हित ही होगा।“    “ हे परमपिता परमात्मन ! आपसे प्रार्थना है कि आप मुझे उस साधन का विधि विधान बताइये। मैं मृत्युलोक में जाकर आपके उस साधन का प्रचार करूँगा और

 उन्हें यह साधन करने के लिए पे्ररित करूँगा।“नारद ने करबद्ध होकर कहा।

          “ हे वत्स ! दु:ख-शोक दूर करने वाला वह साधन भगवान सत्यनारायण का व्रत और पूजन है। भक्ति और श्रद्धा के साथ धर्मपरायण होकर भगवान सत्यनारायण का व्रत और 

पूजन करें। भक्ति भाव से नैवेद्य ,केले ,शहद,घी,शक्कर अथवा गुड़,दूध और गेहूँ का आटा लेैं। उसका प्रसाद बनाये।इन सबको यथोचित लेकर भगवान को अर्पण करें। 

अपने बन्धु-बांधवों सहित ब्राह्मणों को भोजन कराएं । इसके पश्चात स्वयं भोजन ग्रहण करें । रात्रि में भजन-संगीत का आयोजन कर भगवान सत्यनारायण का गुणगान करें।“

 भगवान नारायण ने बताया।

           “ प्रभु ! इस व्रत को किस दिन करना चाहिए । पूजन किसके व्दारा कराया जाना होेता है। बताएंर्षोर्षो“नारद ने प्रश्न  किया।

            “ हे नारद ! यह व्रत किसी भी दिन किया जा सकता है। सन्ध्या के समय ब्राह्मण को बुलवाकर भगवान सत्यनारायण का पूजन-हवन आदि करना चाहिए तथा पूर्व में मेरे व्दारा 

कही गई साधु वैश्य की कथा का पाठ किया जाए। यह कथा मुझे ठीक उसी तरह प्रिय है जिस तरह मुझे पुरूष सूक्त प्रिय है। अत: पुत्र नारद,अब तुम मृत्यु लोक में जाओ और भगवान 

सत्यनारायण के व्रत और पूजन का प्रचार कर मनुष्यों को पे्ररित करो। सुनो वत्स ! जो कोई तेरे और मेरे इस संवाद को भक्ति भाव पूर्वक पठन पाठन करेगा उसे सत्य नारायण भगवान

 के व्रत और पूजन के बराबर मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी।“

      “ हे परम दयालु नाथ ! यदि आप प्रसन्न है तो मैं आपके श्रीमुख से साधु वैश्य की कथा सुनना चाहता हूँ।“   भगवान नारायण प्रसन्न मुद्रा में नारद के प्रति मधुर वचनों से बोले:-

      “ हे वत्स ! तुम्हारे हृदय में मृत्युलोक के प्राणियों के प्रति अथाह दया है । इसलिए मैं साधु वैश्य की कथा तुम्हें पुन: सुनाता हूँ । तुम इसे ध्यान से सुनो और मृत्युलोकवासियों के 

कल्याण में सहयोगी बनो। पुत्र नारद सुनो-  

       श्री मद् नारायण उवाच

      “ किसी समय सुन्दर काशीपुरी में एक अत्यन्त धनाड्य साधु नामक वैश्य रहा करता था । वह बहुत ही सम्पन्न था । उसके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं था । सैकड़ों एकड़ 

ज़मीन में उसकी खेती हुआ करती थी। उसके पास अनेक प्रकार के हीरे-जवाहरात और कीमती वस्तुएं थी। उसकी तिजोरी में अपरिमित धन भरा हुआ था। घर-बाहर उसके पास वैभवता

 और सम्पन्नता का अभाव नहीं था। उसके आंगन में धन की वषाZ हुआ करती थी।साक्षात् लक्ष्मी उस पर प्रसन्न थी। इतनी अपार सम्पत्ति को संभालने वाला उसका अपना कोई वारिस

 नहीं था। विवाह को दस वर्ष हो गए थे किन्तु अब तक उसकी पत्नी लीलावती की गोद भरी नहीं थी। उसने सन्तान प्राप्ति के लिए चारों धाम की यात्राएं की,तीर्थों में गया। कई प्रकार के 

व्रत-उपवास और कर्मकाण्ड करवाएं किन्तु उसकी पत्नी लीलावती की गोद  फिर भी सुनी ही रही।

अनेक यात्राओं और पूण्य कार्य का अनुकूल परिणाम न मिलने से उसने अब सभी तरह के कार्य करना ही बन्द कर दिए। वह और उसकी पत्नी लीलावती सन्तान सुख से वंचित हो दु:खी 

रहने लगे।    एक बार साधु वैश्य चन्देल देश से व्यापार करके लौट रहा था।भद्रशीला नदी के तट पर चन्देल देश के राजा महन्त प्रतापसिंह सपरिवार भगवान सत्यनारायण का व्रत और 

पूजा कर रहे थे। साधु वैश्य ने चन्देल देश के राजा महन्त प्रतापसिंह को व्रत और पूजा करते हुए देख लिया।वह भी उस पूजा स्थल में उपस्थित हुआ। पूजनादि से निवृत्त होने के बाद राजा 

महन्त प्रतापसिंह अपने हाथों से भक्तों को प्रसाद आदि वितरण करने लगे। जब महन्त प्रतापसिंह,साधु वैश्य को प्रसाद देने लगे तब साधु वैश्य ने करबद्ध होकर पूछा-

            “ हे राजन! भक्तियुक्त चित्त  से यह आप किस तरह का व्रत और पूजन कर रहे है।इस व्रत और पूजन से आपकी कौन सी अभिलाषा पूर्ण हुई है।मैं सुनना चाहता हूंं।कृपया आप मुझे बताइए।“ं

            “ हे वैश्य! मैं सन्तान प्राप्ति के लिए महाशक्तिमान भगवान सत्यनारायण का व्रत और पूजन कर रहा हूंं। इस व्रत और पूजन से भगवान सत्यनारायण प्रसन्न होकर पुत्र रत्न और धन-धान्य से अपने भक्तों को सम्पन्न कर देते है।“

            “ हे राजन!मुझे भी इस व्रत और पूजा का विधि विधान बताइए। मैं आपके कथनानुसार इस व्रत और पूजा को करूंगा। मेरी भी सन्तान नहीं है। मुझे पुत्र हो या पुत्री कोई तो सन्तान चाहिए ।“

            “ हे वैश्य!सन्तान के बिना गृहस्थ का जीवन सुना ही रहता है। पुत्र हो या पुत्री इसमें कोई अन्तर नहीं पड़ता। सन्तान तो सन्तान होती है। तुम मात्र सन्तान प्राप्ति की अभिलाषा से भगवान सत्यनारायण भगवान का व्रत और पूजन करो।तुमको अवश्य ही सन्तान की प्राप्ति होगी।“  

राजा महन्त प्रतापसिंह से भगवान सत्यनारायण के व्रत और पूजन का विधि विधान सुन साधु वैश्य खुशी-खुशी अपने घर गया।साधु वैश्य ने उसकी पत्नी लीलावती से राजा महन्त प्रतापसिंह व्दारा किये जा रहे व्रत और पूजन का वृतान्त कह सुनाया। लीलावती ने कहा-

            “ स्वामी वैश्य ! आप राजा महन्त प्रतापसिंह के वचनों को यदि सत्य मानते हैं तो जो उचित हो वही कीजिए।“

            “हे प्राणप्रिये! यदि भगवान सत्यनारायण वास्तव में अपने भक्तों की प्रार्थना स्वीकार करते हैं तो मैं संकल्प करता हूंं कि जब मेरे यहॉं सन्तान होगी मैं भी इस व्रत और पूजन को अवश्य ही करूंंगा।“

साधु वैश्य ने जब यह संकल्प लिया तब लीलावती बहुत प्रसन्न हो गई ।उसे पूरा विश्वास हो गया कि भगवान सत्यनारायण उसकी सूनी गोद अवश्य ही सन्तान से भर देंगे,वह चाहे पुत्र हो या पुत्री कोई फर्क नहीं  पड़ता।

            समय बीतता गया। एक सुबह लीलावती को बहुत मितलियॉं आने लगी।बार-बार उबकाईयॉं आने के बावजूद भी उसका हृदय आनन्द विभोर हो रहा था।साधु वैश्य ने तुरन्त ही वैद्य को बुलवाया। वैद्य ने लीलावती का परीक्षण कर कहा-

            “ बधाई हो साधु वैश्य!तुम पिता बनने वाले हो।“

            “क्या र्षोर्षो वास्तव में मैं पिता बनने वाला हूंं।“साधु वैश्य खुशी से अभिभूत हो गया।

लीलावती ने लाज के मारे घुंंँघट में नज़रें छुपा ली और मुस्कराने लगी। साधु वैश्य ने लीलावती को अपने वक्ष से लगाकर बहुत स्नेह किया और उसे शुभकामनाएं दी।

            दसवें महिने में लीलावती ने चॉंद सी सुन्दर कन्या को जन्म दिया।वह सोलहों कलाओं से परिपूर्ण बालिका थी। उसके मुख मण्डल पर तेज जगर-मगर कर रहा था। साधु वैश्य ने बालिका को अपनी गोद में लेकर चूम लिया और उसके माथे पर काला टीका लगा दिया। लीलावती पुत्री को प्राप्त कर भावविभोर हो गई। पुरोहित को बुलवाकर बालिका का नामकरण करवाया । पुरोहित ने बालिका का नाम कलावती रख दिया। कलावती छह महिने में घुटने-घुटने चलने लगी। लीलावती ने उचित समय जानकर पति साधु वैश्य से कहा-

            “ स्वामी ! आपने संकल्प लिया था कि भगवान सत्यनारायण जब हमारी गोद में सन्तान  भर देगा तब हम भगवान सत्यनारायण का व्रत और पूजन करेंगे।“

            “ बात तो तुम ठीक कहती हो। लेकिन मेरी व्यस्तता के कारण अभी यह व्रत और पूजन किया जाना संभव नहीं। लेकिन हॉं,कलावती के विवाह के समय हम यह व्रत और पूजन अवश्य करेंगे। तुम निश्चिन्त रहो। तब तक मैं व्यापार से लौट कर आ जाऊँगा।“

            “ठीक है ,जैसी आपकी सुविधा ।“लीलावती ने कहा।

                   यह आश्वासन देकर साधु वैश्य व्यापार के लिए दूसरे देश चला गया। इस तरह साधु वैश्य प्रत्येक बार व्यापार करने दूसरे देश चला जाता और बहुत सा धन कमाकर ले आता ।

            धीरे-धीरे समय बीतता गया। कलावती चन्द्रमा के कलाओं के समान बढ़ने लगी । अब वह घर-आंगन में चहकने लगी।पिता का सारा व्यापार,लेखा-जोखा संभालने लगी। वह पिता के व्यापार में एक तरह से व्यवस्थापक का काम संभालने लगी। पिता साधु वैश्य पुत्री को पुत्र के समान काम करते देखकर बहुत प्रसन्न हुआ करते। वे मन ही मन प्रसन्न रहते और सोचते,पुत्र और पुत्री एक समान होती है। जितनी समझदारी पुत्र में होती है उससे कहीं ज्यादा समझदारी पुत्री में होती है। पुत्र एक बार अवश्य ही उत्तेजित और उच्छªंखल हो जाता है किन्तु पुत्रियॉं ऐसा नहीं करती।

            साधु वैश्य और उसकी पत्नी लीलावती ने सोचा,पुत्री कलावती अब सयानी हो गई है। पुत्री कलावती की आयु भी विवाह योग्य हो रही है र्षोर्षो क्यों न पुत्री कलावती का विवाह किसी सुयोग्य वर से कर दिया जाय।दोनों पति-पत्नी ने खूब सलाह-विचार किया । अन्तत: उन्होने कलावती का विवाह करना निश्चय किया।

            अपने रिश्तेदारों और मित्रों के माध्यम से साधुवैश्य ने,कलावती के लिए कंचनपुर नगर के धनाड्य व्यक्ति प्रभुस्वामी के पुत्र कृष्ण स्वामी वैश्य का चयन किया।

साधु वैश्य ने अपने बन्धु-बांधवों सहित प्रसन्नचित्त होकर अपनी पुत्री कलावती का विवाह प्रभुस्वामी के पुत्र कृष्ण स्वामी वैश्य से सम्पन्न करा दिया।

            लीलावती उसके पति कृष्ण स्वामी वैश्य के साथ बहुत खुश रहने लगी।साधुवैश्य ने सोचा,उसके पास जो कुछ भी है पुत्री कलावती और दामाद कृष्ण स्वामी वैश्य का ही तो है। यह सोचकर साधुवैश्य ने दामाद कृष्ण स्वामी वैश्य को अपने साथ व्यापार  करने के लिए बुला लिया।

             रत्नसार नगर के राजा चन्द्रकेतु हुआ करते थे। उसके राज्य में व्यापार का विशाल केन्द्र था। वे अपने राज्य में व्यापार करने के लिए व्यापारियों को आमंत्रित किया करते थे। इस व्यापार केन्द्र में दूर-दूर से व्यापारी आया करते। राजा चन्द्रकेतु को इन व्यापारियों से बहुत अच्छा कर मिल जाया करता था। अपने कार्य में कुशल साधु वैश्य अपने दामाद के साथ विशाल रथ लेकर व्यापार करने के लिए रत्नसार नगर के  उस व्यापार केन्द्र में गए। ।

            साधुवैश्य अपने दामाद के साथ रत्नसार नगर के हरि-दर्शन धर्मशाला में व्यापार के सिलसिले में ठहरे । वे सारा दिन व्यापार में व्यस्त रहते और रात होने पर हरि-दर्शन धर्मशाला में विश्राम करते। इस तरह उन्होने एक वर्ष तक रत्नसार नगर में व्यापार कर बहुत सा धन संग्रह किया।

            एक रात रत्नासार नगर के राजकोष से चोर बहुत सा धन चुराकर भागे।  राजदूतों ने चोरों का पीछा किया।चोर घबराकर हरि-दर्शन धर्मशाला में जा घुसे। वहॉं अपने आपको व्यापारी बताकर उन चोरों ने उस रात धर्मशाला में डेरा डाला। अवसर का लाभ उठाकर चोरों ने राजकोष से चुराया हुआ धन दैववश साधु वैश्य के सामान में छुपा दिया और चुपचाप अपने अपने स्थान पर आकर सो गए। राजदूतों को खबर लगी कि चोर राजकोष का सारा धन लेकर हरि-दर्शन धर्मशाला में जा छुपे हैं। राजदूतों ने हरि-दर्शन धर्मशाला में छापा मारा।सारा धन साधुवैश्य और कृष्ण स्वामी वैश्य के सामान में छुपा हुआ पाया गया। राजदूतों ने साधुवैश्य और कृष्ण स्वामी वैश्य को बन्दी बनाकर राजा चन्द्रकेतु के समक्ष खड़ा किया। राजा चन्द्रकेतु से राजदूत बोले-

            “ महाराज की जय हो। हम ये दो चोर पकड़कर लाए है।“

            “ लेकिन महाराज हम चोर नहीं है।हम काशीपुरी नगर के व्यापारी साधुवैश्य और ये  मेरे दामाद कृष्ण स्वामी वैश्य है।“

            “तुम असत्य वचन बोल रहे हो। तुमने ही राजकोष से धन चुराया है। अन्यथा ये धन तुम्हारे पास कहॉं से आयार्षोर्षो “राजा क्रोधित हो  बोले।

            “ ये हम नहीं जानते किन्तु हमने कोई चोरी नहीं की।“

साधुवैश्य गिड़गिड़ाए। चंूंकि साधुवैश्य के सामान से राजकोष का धन जप्त किया गया है। इसलिए साधुवैश्य और उनके दामाद पर चोरी का आरोप लगाया गया।

            “ इनसे सारा धन कब्जे में ले लो और इन दोनों चोरों को छह माह के लिए कारागार में बन्द कर दो।“राजा चन्द्रकेतु ने आदेश दिया।

            सैनिकों ने साधुवैश्य और कृष्णा स्वामी वैश्य को छह माह के लिए कारागार में बन्द कर सारा धन राजकोष में जमा कर दिया।

            समय निरन्तर परिवर्तनशील है। वह कभी किसी के लिए नहीं ठहरता। बहुत दिनों तक पति और दामाद घर लौट कर नहीं आने से लीलावती और पुत्री कलावती बहुत चिन्तित हो गई। उन्होने अपने रिश्तेदारों से पति और दामाद को खोजकर लाने के लिए निवेदन किया। सभी ने साधुवैश्य तथा दामाद कृष्ण स्वामी वैश्य की खोजबीन की किन्तु कहीं पर उनका पता नहीं मिला। माता-पुत्री और अधिक चिन्तित हो गए।

            काशीपुरी नगर के चोरों को ज्ञात हुआ कि साधुवैश्य और उनके दामाद कृष्ण स्वामी बहुत लम्बे समय से व्यापार के लिए परदेश गए हुए है और अब तक लौट कर नहीं आए हैं। चोरों के गिरोह ने एक रात साधुवैश्य के घर सेंध लगाये की योजना बनाई।

            लीलावती और पुत्री कलावती गहरी निद्रा में सो रही थी। रात बहुत गहरा गई थी। उसी रात तीसरे पहर चोरों ने साधु वैश्य के घर डाका डाला और सारा धन चुरा ले गए।

            सुबह जब लीलावती और पुत्री कलावती की नींद खुली । देखती है कि तिजोरी का ताला खुला पड़ा है। तिजारी खाली पड़ी है।वे दोनों घबरा गई। दोनों रोते-पिटते काशीपुरी नगर कोटवाल के पास गई और सारा वृतान्त कह सुनाया। काशीपुरी नगर कोटवार ने चोरों का पता लगाने की बहुत कोशिश की किन्तु चोरी हुए धन का पता नहीं लग पाया।

लीलावती और कलावती पर आर्थिक संकट के बादल घिर आए। वे धन के अभाव में पीड़ित होने लगी। घर का खर्च चलना कठिन हो गया। दैववश ऐसे कठिन समय में कोई भी साथ नहीं देता।लीलावती और कलावती के साथ भी यही स्थिति उत्पन्न हो गई। दुदिZन के इन दिनों उनके सहायतार्थ कोई भी रिश्तेदार,बन्धु-बांधव आगे नहीं आए। दोनों मॉं-बेटी दु:खी हो गई।

            दिन तो किसी तरह बीत जाता किन्तु भूखे पेट रात को सोया नहीं जा सकता। कहते हैं कि भगवान किसी दुश्मन को भी भूखा नहीं सुलाये। किन्तु यहॉं स्थिति कुछ इसी तरह की ही उत्पन्न हो गई। लीलावती और कलावती को इस विपद स्थिति में भूखा ही सोना पड़ा । लेकिन वे अधिक दिन तक भूखी नहीं रह सकती थी।                           

एक दिन भूख प्यास से पीड़ित और दु:खी कलावती भोजन की चिन्ता में भटक रही थी। काशीपुरी नगर के एक ब्राह्मण के घर भगवान सत्यनारायण का पूजन हो रहा था। वहॉं ब्राह्मण के रिश्तेदार और मित्रगण पूजन मेें भाग लेने आए हुए थे। इस कारण बाहर से भीड़ दिखाई दे रही थी। कलावती ने सोचा,यहॉं  कोई समारोह हो रहा है तो भोजन भी अवश्य ही मिलेगा।इस आशय से वह उस ब्राह्मण के घर जा पहुंंची। उसने ब्राह्मण और उसकी पत्नी को सत्यनारायण का व्रत और पूजन करते हुए देखा। पूजन के बाद ब्राह्मण ने कलावती को भोजन और प्रसाद दिया। उसने माता लीलावती के लिए कुछ प्रसाद और भोजन दौने में ले लिया और दौना लेकर घर चली आई।

                        बेटी कलावती को बहुत देर तक घर वापस लौटते हुए न पाकर माता लालीवती बहुत चिन्तित हो गई। उसके मन में तहर-तरह के कुविचार आने लगे। न जाने कलावती भूख-प्यास के मारे कहॉं चली गई होगी। कहीं ऊँच-नीच हो जाय तो वह पति और दामाद को क्या जवाब देंगी। वह अभी यह सोच ही रही थी कि कलावती आ पहुंंची। कलावती के हाथ में एक बड़ा दौना था। माता लीलावती उसके हाथ में दौना देख आश्चर्य चकित हो गई। उसे आशंका हुई। उसने पूछा-

                        “ पुत्री कलावती! तू अब तक कहॉं रही। तेरे हृदय में ऐसी कौन सी बात है जो तू बिना बताए ही कहीं चल दीर्षोर्षो“

                        “ हे माता! मैं भोजन की तलाश में भटक रही थी कि एक ब्राह्मण के आंगन में लोगों की भीड़ देखी। सोचा शायद यहॉं कोई समारोह हो रहा है,भोजन अवश्य ही मिल जाएगा। मैं वहॉं गई। देखा एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी भगवान सत्यनारायण का व्रत और पूजन कर रही है। मैंने सोचा,यहांंं रूककर प्रसाद लूंं। इसलिए वहॉं रूक गई। पूजन के बाद ब्राह्मण ने दौने में यह भोजन दिया।“

                        “ पुत्री कलावती! तेरे पिताश्री ने संतान प्राप्ति के लिए भगवान सत्यनारायण का व्रत और पूजन करने का संकल्प किया था। जिससे तू पैदा हुई है किन्तु तेरे पिताश्री ने अब तक अपना संकल्प पूरा नहीं किया।“लीलावती ने कहा।

                        “माताश्री ! आपकी बातों से मुझे ऐसा लग रहा है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे पिताश्री ने अब तक अपना संकल्प पूरा नहीं किया हो। जिसके कारण भगवान सत्यनारायण रूष्ट हो गए हो और उसने रूठने के कारण आज हमें यह कठिनाईयॉं झेलनी पड़ रही हो। क्यों न हम भगवान सत्यनारायण का व्रत और पूजन करें ।“

                        “ तुम ठीक कहती हो बेटी। सबसे पहले हम भगवान सत्यनारायण का व्रत और पूजन करें। हो सकता है उनके रूठने के कारण ही यह सब संकट आ रहे हो। यदि हम व्रत और पूजन करें तो भगवान सत्यनारायण हमारे अपराध क्षमा कर देंगे और हम इस संकट से मुक्त हो जायेंगे।“लीलावती बोली।

                       

मॉं-बेटी ने विचार-विमर्श कर भगवान सत्यनारायण के व्रत और पूजन की तैयारी की। उसने अपने सगे-संबंधियों को आमंत्रित किया और सपरिवार बन्धु-बांधव सहित भगवान सत्यनारायण का पूजन और व्रत किया। लीलावती ने भगवान सत्यनारायण से प्रार्थना की,-

                        “ हे परमपिता सत्यनारायण भगवान!यदि तुमने हमें क्षमा कर दिया हो और मेरे इस व्रत तथा पूजन को स्वीकार कर लिया हो तो मेरे पति और दामाद को सकुशल वापस घर लौटा ले आएं। हम मॉं-बेटी ने बहुत दु:ख झेले हैं। हम पर कृपा करो हे नाथ।“

                        भगवान सत्यननारायण परम दयालु है। अपने प्रियजनों की आवाज़ शीघ्र सुन लेते हैं। वे उसी तरह अपने प्रियजनों को प्रताड़ित करते है जिस तरह एक पिता या माता अपनी संतान को सुधारने के लिए प्रताड़ित करते हैं। हालांकि उनका उद्देश्य अपने प्रियजनों को दु:खी और पीड़ित करना नहीं होता लेकिन यदि कोई प्रियजन उनको विस्मृत करता है तो वे उन्हें स्मरण दिलाने के लिए किसी न किसी संकट में डाल देते है।

                        भगवान सत्यनारायण उसी रात राजा चन्द्रकेतु के स्वप्न में गए।उन्हें अपना दिव्य रूप दिखाया और कहा-

                        “ हे राजन! जिन दो वैश्यों पर तुमने चोरी का आरोप लगाकर कारागार में बन्दी बनाया हैं। वे वास्तव में निरापराध है। वे निर्दोष है। उन्हें तुम शीघ्र ही बन्दीग्रह से स्वतंत्र कर दो। यदि तुमने मेरे आदेश का पालन नहीं किया तो मैं तेरे सारे राज्य वैभव को समाप्त कर दूंंगा।“

                        स्वप्न देखकर राजा चन्द्रकेतु हड़बड़ाकर उठ बैठे। जब जब वे सोने का प्रयास करने लगते उनके कानों में भगवान सत्यनारायण की दीघZ-गंभीर वाणी सुनाई देती। वे सारी रात अपने कक्ष में टहलते रहे और स्वप्न के बारे में विचार करते रहे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि यह स्वप्न सच है या नहीं अथवा यह कोई भ्रम है।

                        प्रात: होते ही राजा चन्द्रकेतु ने अपने सलाहकारों और मंत्रियों को बुलवाकर एकत्र किया तथा स्वप्न का सारा वृतान्त कह सुनाया। मंत्रियों और सलाहकारों ने सोच-समझकर कहा-

                        “ महाराज!भगवान सत्यनारायण अवश्य ही आपके स्वप्न में आए होगे। यह असत्य नहीं हो सकता और यह मति भ्रम भी नहीं हो सकता। जब उन्हीने आपको यह आदेश प्रदान किया है तो हम मनुष्यों के आदेश और निर्णय से क्या होगा। भगवान सत्यनारायण ने जो आदेश दिया है। उसका पालन किया जाना हमारा परम कत्र्तव्य प्रतीत होता है।“

                        मंत्रियों और सलाहकारों के मशविरो को सुनकर राजा चन्द्रकेतु ने सैनिकों को आज्ञा दी कि वे उन दोनों वैश्यों को कारागार से तत्काल मुक्त कर सभा में ले आए। राजा की आज्ञा पाकर सैनिकों ने साधु वैश्य और उनके दामाद कृष्ण स्वामी वैश्य को कारागार से बन्धन मुक्त कर राजसभा में लाकर ससम्मान आसन पर बिठाया। राजा चन्द्रकेतु विनम्र होकर बोले-

                        “ हे महानुभावो! आप मुझे क्षमा करें। आप लोगों को दैववश तथा भावीवश ही ऐसा कठिन दु:ख प्राप्त हुआ है।शायद भगवान सत्यनारायण की कोई इच्छा हो। अब आप लोग स्वतंत्र है। कोई भय नहीं है। आप लोग चाहे तो इसी राज प्रसाद में रहें या चाहे तो आप प्रस्थान कर सकते है।“

                        “ हे राजन ! हमने अवश्य ही भगवान सत्यनारायण का कोई अपराध किया होगा जिससे हमें यह महासंकट झेलना पड़ा। अवश्य ही  भगवान सत्यनारायण ने हमें स्मरण कराने के लिए यह कोई खेल खेला होगा। हमें जाने की आज्ञा दें।“साधु वैश्य ने कहा।

ऐसा कह कर साधुवैश्य और कृष्ण स्वामी जाने लगे। तब राजा चन्द्रकेतु ने उन्हें नए-नए आभूषण वस्त्र और अनेक उपहार दिए। इतना ही नहीं जितना उनका धन था उससे दूना धन लौटाकर उन्हें आदर सहित विदा किया।

 

                        साधु वैश्य अपने दामाद के साथ वापस हरि-दर्शन धर्मशाला लौट आए। सारा धन और राजा चन्द्रकेतु व्दारा दिये हुए कीमती सामान रथ में भरवा लिया। शुभ घड़ी देखकर वे रथ पर सवार होकर अपने नगर काशीपुरी की ओर चल पड़े।

                        चलते-चलते वे राजा चन्द्रकेतु के राज्य से बहुत दूर निकल आए।दोपहर का समय हो रहा था। भोजन अवकाश का समय था। साधुवैश्य ने दामाद से भोजन करने का आग्रह किया। दामाद ने तुरन्त ही स्वीकार कर लिया। उन्होने एक नदी किनारे रथ रोका। घोड़ों को पेड़ के नीचे बांध दिया और भोजन करने बैठ गए।भोजन के बाद वे विश्राम करने लगे। उसी समय एक दण्डी वेषधारी ब्राह्मण दूर से आता दिखाई दिया। पास आकर उसने साधु वैश्य से कौतुहलवश पूछा-

                        “ हे वैश्य!  तेरे इस रथ में ये इतना सारा क्या भरा हुआ है जो इतना ढ़ेर सारा दिखाई दे रहा हैर्षोर्षो“

                        “ हे दण्डीधारी बाबा ! आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं र्षोर्षो क्या हमारा धन लेने की इच्छा हैर्षोर्षो अरे बाबा ! हमारे रथ में तो पूजन सामग्री बेल पत्ते भरे हुए हैं।“साधुवैश्य ने कठोरतापूर्वक दण्डीधारी ब्राह्मण से कहा।

दण्डी वेषधारी ब्राह्मण ने कहा-

                        “ठीक है भई। मत बताओ लेकिन तुम्हारे वचन सत्य तो हैं न र्षोर्षो“

                        “ हॉं….हॉ…. सत्य ही है ।अब जाओ यहॉं से…..“साधु वैश्य कठोरतावश बोला।

                        “ तुम्हारे वचन सत्य हो।“

ऐसा कहकर दण्डी वैषधारी ब्राह्मण नदी किनारे जाकर चुपचाप बैठ गया। वह ब्राह्मण यों ही बैठे रहा। जब काफी समय बीत गया। तब साधुवैश्य ने दामाद को आगे की यात्रा प्रारंभ करने के लिए कहा। वे दोनों जब रथ के पास आए। साधुवैश्य ने देखा,उसके रथ में पहले की अपेक्षा अधिक उठाव दिखाई दे रहा है। वे सोचने लगे,यह अचानक हो क्या गया जो रथ में हमारा धन और सामान इतना ऊँचा उठा प्रतीत हो रहा है। हो न हो कोई बात अवश्य है। रथ पर एक विशाल चादर लगी थी जो सारे सामान को ढंकी हुई थी। उन्होने चादर का एक कोना ऊपर उठाकर देखा। वे देखते ही रह गए। वहॉं धन और कीमती सामान के स्थान पर बेलपत्ते भरे हुए थे। देखते ही साधु वैश्य को मूछाZ आ गई। वे धरती पर गिर पड़े। श्वसुर को इस तरह धरती पर गिरते देख दामाद घबरा गए। उन्होने झट से नदी से पानी लाया। श्वसुर के चेहरे पर छींटा। कुछ ही क्षणों में साधु वैश्य होश में आ गए। दामाद के पूछने पर उन्होने कहा-

            “रथ में धन और कीमती सामान के स्थान पर बेल पत्ते भरे हुए है।“

सुनकर दामाद कृष्ण स्वामी वैश्य सोच में पड़ गए। उन्हें स्मरण आया,जब साधु वैश्य ने दण्ड धारी ब्राह्मण से कहा था,हमारे रथ में पूजन का सामान बेलपत्ते भरे हुए है। दामाद कृष्ण स्वामी वैश्य स्थिति को तत्क्षण ही समझ गए।वे बोले-

                        “ पिताश्री् ! आपने उस दण्डधारी ब्राह्मण को कठोर वचन कहे थे और यह कहा था कि हमारे रथ में धन नहीं बेलपत्ते भरे हुए है। बस,उन्होने कहा था,तुम्हारे वचन सत्य हो। यह उन्ही दण्डधारी ब्राह्मण का चमत्कार है। संभवत: भगवान ने हमारी परीक्षा ली हो।“

                        “ अरे ढूँढो,उस दण्डधारी ब्राह्मण को। हमको उनके शरण में जाना चाहिए तभी हमारा धन और कीमती सामग्री वापस प्राप्त हो सकेगी।“

                        “ वो दण्डधारी ब्राह्मण तो अब भी नदी किनारे बैठे हुए है। पिताश्री हम उनके पास चलें।उनसे क्षमा याचना करें। शायद वे हमें क्षमा कर देें। चलो।“

साधुवैश्य अपने दामाद के साथ नदी किनारे चुपचाप बैठे दण्डी वेषधारी ब्राह्मण के पास गए।भक्तिभाव से उनके चरण स्पर्श किये और बोले-

                        “हे ब्राह्मण देवता ! हमने आपसे असत्य वचन कहे थे। हमने आपका अपराध किया है। उसके लिए हमें क्षमा करें।“

                        “तुमने घोर अपराध किया है। न जाने ऐसा तुम कितनी बार असत्य बोल-बोलकर अपने आपको और भगवान सत्य नारायण को धोखा दे रहे हो।“ब्राह्मण बोले।

                        “हे दण्डधारी ब्राह्मण ! आप हमें क्षमा कर दें। अब हम कभी असत्य नहीं बोलेंगे। मन-कर्म-वचन से सत्य का पालन करेंगे। हम संकल्प करते हैं कि भविष्य में कदाचित ऐसा नहीं करेंगे। यदि आप हमें क्षमा कर देंगे तो भगवान सत्य नारायण भी अवश्य ही हमें क्षमा करेंगे। हमने असत्य वचन बोलकर भगवान सत्यनारायण के व्रत और पूजन का संकल्प भी पूरा नहीं किया। संभवत:यह उसी असत्य वचन का दुष्परिणाम होगा।“

                        “ठीक हैं। हमने तुमको क्षमा कर दिया। जाओ। अब जाओ। और हॉं,जो वचन दिया है उसे अब पूरा अवश्य करना। भगवान सत्यनारायण तुम्हारी मनोकामनाएं अवश्य पूरी करेंगे।“दण्ड वेषधारी ब्राह्मण बोले।

दण्ड वेषधारी ब्राह्मण को दण्डवत प्रणाम कर साधु वैश्य और उनके दामाद वापस लौटकर रथ के समीप आये। वे देखते हैं कि उनका रथ पहले की तरह धन और कीमती सामान से पुन:भर गया। वे प्रसन्न हो गए। भगवान सत्यनारायण को हृदय में प्रणाम किया और अपने नगर काशीपुरी जाने के लिए चल पड़े।

                        दिन का तीसरा पहर हो रहा था। वे अपने नगर काशीपुरी के समीप पहुंंच गए। साधु वैश्य ने अपने एक सेवक को घर खबर करने भेजा कि जाकर बता दो कि हम लोग नगर के समीप आ गए है। जल्दी ही घर पहुंंच जाएंगे।

                        जिस समय साधुवैश्य का सेवक घर जा पहुंंचा उस समय माता लीलावती और पुत्री कलावती भगवान सत्यनारायण का पूजन कर रही थी।सेवक ने आकर कहा-

                        “स्वामिनी! हमारे स्वामी वैश्य नगर व्दार तक आ गये हैं। वे शीघ्र ही घर पहुंंचने वाले हैं। उन्होने आपको सूचना देने के लिए मुझे भेजा है।“

                        “ मेरे स्वामी वैश्य आ रहे हैं। भगवान सत्यनारायण का पूजन करने के बाद मैं शीघ्र ही उनके स्वागत के लिए जा पहुंंची।“

            लीलावती ने भगवान सत्यनारायण का पूजन कर प्रणाम कर प्रार्थना की,-

                        “ हे  भगवन! आपने मेरी कामना पूर्ण कर दी। मेरे पति और दामाद सकुशल  लौट कर आ रहे हैं। इसके लिए मैं आपका किस तरह धन्यवाद करूँ।“

तत्पश्चात लीलावती ने प्रसाद ग्र्रहण किया और पति के स्वागत के लिए सेवक के साथ चल दी। जाने के पूर्व वह कलावती से बोली-

                        “बेटी तेरे पिताश्री और मेरे दामाद सकुशल लौट आ रहे हैं। तू शीघ्र पूजन करके दूसरे सेवक को साथ लेकर आ जाना।“

                        “ अच्छा मॉं!तुम चलो मैं पीछे से आती हूंं ।“कलावती बोली

                        कलावती अब तक पूजन के लिए तैयार नहीं हो पाई थी। उसने जब यह सुना कि उसके पति स्वामी वैश्य भी पिताश्री के साथ सकुशल लौट कर आ रहे हैं। वह खुशी से फूली नहीं समाई। उसने सोचा,पहले पति से जा मिलूंं,उसके बाद घर लौटकर भगवान सत्यनारायण का पूजन करूंंगी। यह सोचकर कलावती बिना पूजन और प्रसाद ग्रहण किये पति के मोह में सरपट दौड़ते हुए नगर के बाहर गई। दूर से उसने देखा कि सड़क के किनारे भीड़ एकत्र है। पास ही पिताश्री और माता लीलावती विलाप कर रहे हैं। वह भी विलाप करने लगी। पास जाकर बोली-

                        “पिताश्री!क्या हो गया है। आप लोग विलाप क्यों कर रहे हैंर्षोर्षो“

एकत्र भीड़ से आवाज़ आई-

                        “दामाद रथ सहित खाई में जा गिरे हैैं।“

कलावती बड़ी ज़ोरो से चीख मारकर विलाप करने लगी।

                        “ नहीं…………ऐसा नहीं हो सकता। मेरे पति के साथ ऐसा नहीं हो सकता।“

                        भीड़ में से एक विप्र कलावती के पास आकर उसके सिर पर हाथ रखकर बोले-

                        “ बेटी ! मुझे तो लगता है कि यह कोई दैवी प्रकोप होगा। देखो,तुम्हारे पिताश्री भी रथ में सवार थे किन्तु अकेले दामाद जी ही रथ सहित खाई में जा गिरे।ऐसा कभी होता है क्यार्षोर्षो“

                        “ ऐसा कैसे हो सकता है। कहीं भगवान सत्यनारायण का प्रकोप तो नहीं है। मैं अभी भगवान सत्यनारायण का पूजन और प्रसाद लिये बिना पति मोह में दौड़ते आ गई हूंं। कहीं भगवान सत्यनारायण तो रूष्ठ नहीं हो गए र्षोर्षो “ कलावती विलाप करने लगी।

                        “ मुझे ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। जा बेटी पहले भगवान सत्य नारायण का पूजन कर प्रसाद ग्रहण कर ले। संभवत: भगवान सत्यनारायण तेरी भूल क्षमा कर देंगे।“विप्र ने कलावती को समझाते हुए कहा।

कलावती विलाप करते हुए माता लीलावती से लिपट पड़ी। लीलावती ने बेटी कलावती को समझाईश दी-

                        “ जा बेटी! पहले घर जाकर भगवान सत्यनारायण का प्रसाद ग्रहण कर ले। भगवान सत्यनारायण सबकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। तेरी भी मनोकामना पूर्ण कर देंगे।“

                        माता लीलावती की समझाईश पर कलावती सेवक के साथ घर जा पहुंंची। भगवान सत्यनारायण की पूजा का धूप-दीप अब तक जल रहा था । कक्ष में सुगन्धित धूप की सुगन्ध व्याप्त हो रही थी। सामने पूजन की सामग्री रखी हुई थी। वह देखती है कि जो विप्र उसे उस घटना स्थल पर समझा रहे थे वो ही विप्र यहॉं पूजन कर रहे है। उसने यह भगवान सत्यनारायण की महिमा समझी। कलावती भगवान सत्यनारायण को प्रणाम कर पूजन के लिए बैठ गई। विप्र ने पूजन पूर्ण कर कलावती को प्रसाद दिया। उसने प्रसाद ग्रहण किया और भगवान सत्यनारायण के चरणोंं में दण्डवत प्रणाम किया। उसने प्रार्थना की,-

                        “ हे भगवान सत्यनारायण तुम तो अपने प्रियजनों के पालनहार हो।  तुम ज़रा ज़रा सी बात पर रूठ भी जाते हो और प्रसन्न भी हो जाते हो । मुझसे पहले बहुत बड़ी भूल हो गई थी। अत: अब क्षमा करें ।मेरे पिताश्री और मेरे पति को सकुशल घर लौटा दो।“

ऐसी प्रार्थना कर उसने प्रणाम किया और सेवक के साथ रथ पर सवार होकर पति को लेने चली । घटना स्थल पर जाकर देखती है कि उसके पति कृष्ण स्वामी वैश्य सकुशल रथ सहित खाई से ऊपर आ चुके हैै। कृष्णस्वामी को मामूली खरोंचे ही आई है। वह अपने पति से लिपट गई। साधुवैश्य ने पत्नी लीलावती से कहा-

            “ हे भाग्यवती लीला। हमने भगवान सत्यनारायण के बहुत बड़े अपराध किये है। संतान प्राप्ति के लिए भगवान सत्यनारायण के व्रत और पूजन का संंकल्प किया था। भगवान सत्यनारायण ने हमारी प्रार्थना और संकल्प पर ही हमें इतना धन-वैभव से सम्पन्न कर दिया फिर भी हम उनसे विमुख हो गए। हम भगवान नारायण के व्रत और पूजन का संकल्प पूरा नहीं कर पाये। इसीलिए इतनी विपदाएं हम और तुम लोगों पर आती रही।आज हम अपनी भूल स्वीकार कर अपने संकल्प का पालन करते हुए भगवान सत्य नारायण का व्रत और पूजन करते है। सारे रिश्तेदारों ,बन्धु-बांधवों और मित्रों को भगवान सत्यनारायण के व्रत और पूजन के लिए आमंत्रित करो। ताकि कल का काम आज और आज का काम अभी ही पूरा कर लिया जाय।“

            सधु वैश्य ने उसी दिन अपने रिश्तेदारों,बन्धु-बांधवों और मित्रों को आमंत्रित कर भगवान सत्यनारायण का व्रत और पूजन किया और सबको यथायोग दान-दक्षिणा देकर प्रसन्न कर दिया।

            .इतना ही नहीं अब साधु वैश्य प्रतिवर्ष भगवान सत्यनारायण का व्रत और पूजन का समारोह आयोजित करते है तथा निर्धनों-भूखों और बीमारों को दान-दक्षिणा देते हैं।

                        भगवान सत्यनारायण की कृपा से साधु वैश्य धन-धान्य से सम्पन्न होकर कई वषोZं तक सपरिवार आनन्द और सुख के साथ जीवन यापन करते रहे।

.साधु वैश्य की कथा कहने के बाद श्रीमद्भगवान नारायण अन्तर्धान हो गए। तब महषिZ नारद “ भज मन नारायण!  नारायण !!नारायण! !! गाते हुए मृत्यु लोक की और चल पड़े।

 

गंगा जन्म कथा । legend of Ganga Birth

गंगा नदी हिंदुओं की आस्था का केंद्र है और अनेक धर्म ग्रंथों में गंगा के महत्व का वर्णन प्राप्त होता है गंगा नदी के साथ अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं जो गंगा जी के संपूर्ण अर्थ को परिभाषित करने में सहायक है. इसमें एक कथा अनुसार गंगा का जन्म भगवान विष्णु के पैर के पसीनों की बूँदों से हुआ गंगा के जन्म की कथाओं में अतिरिक्त अन्य कथाएँ भी हैं. जिसके अनुसार गंगा का जन्म ब्रह्मदेव के कमंडल से हुआ.

एक मान्यता है कि वामन रूप में राक्षस बलि से
 संसार को मुक्त कराने के बाद ब्रह्मदेव ने भगवान विष्णु के चरण धोए और इस जल को अपने कमंडल में भर लिया और एक अन्य कथा अनुसार जब भगवान शिव ने नारद मुनि, ब्रह्मदेव तथा भगवान विष्णु के समक्ष गाना गाया तो इस संगीत के प्रभाव से भगवान विष्णु का पसीना बहकर निकलने लगा जिसे ब्रह्मा जी ने उसे अपने कमंडल में भर लिया और इसी कमंडल के जल से गंगा का जन्म हुआ था.
गंगा जयंती महत्व | Significance Ganga Jayanti

शास्त्रों के अनुसार बैशाख मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को ही गंगा स्वर्ग लोक से शिव शंकर की जटाओं में पहुंची थी इसलिए इस दिन को गंगा जयंती और गंगा सप्तमी के रूप में मनाया जाता है. जिस दिन गंगा जी की उत्पत्ति हुई वह दिन गंगा जयंती (वैशाख शुक्ल सप्तमी) और जिस दिन गंगाजी पृथ्वी पर अवतरित हुई वह दिन 'गंगा दशहरा' (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) के नाम से जाना जाता है इस दिन मां गंगा का पूजन किया जाता है.

गंगा जयंती के दिन गंगा पूजन एवं स्नान से रिद्धि-सिद्धि, यश-सम्मान की प्राप्ति होती है तथा समस्त पापों का क्षय होता है. मान्यता है कि इस दिन गंगा पूजन से मांगलिक दोष से ग्रसित जातकों को विशेष लाभ प्राप्त होता है. विधिविधान से गंगा पूजन करना अमोघ फलदायक होता है.

पुराणों के अनुसा गंगा विष्णु के अँगूठे से निकली हैं, जिसका पृथ्वी पर अवतरण भगीरथ के प्रयास से कपिल मुनि के शाप द्वारा भस्मीकृत हुए राजा सगर के 60,000 पुत्रों की अस्थियों का उद्धार करने के लिए हुआ था तब उनके उद्धार के लिए राजा सगर के वंशज भगीरथ ने घोर तपस्या कर माता गंगा को प्रसन्न किया और धरती पर लेकर आए। गंगा के स्पर्श से ही सगर के 60 हजार पुत्रों का उद्धार संभव हो सका इसी कारण गंगा का दूसरा नाम भागीरथी पड़ा. 

महाकाली


जब सम्पूर्ण जगत् जलमग्न था और भगवान् विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर योगनिद्रा का आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए। वे दोनों ब्रह्माजी का वध करने को तैयार हो गये। भगवान् विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्माजी ने जब उन दोनों भयानक असुरों को अपने पास आया और भगवान् को सोया हुआ देखा, तब एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान् विष्णु को जगाने के लिये उनके नेत्रों में निवास करनेवाली योगनिद्रा का स्तवन आरम्भ किया। जो इ
स विश्व की अधीश्वरी, जगत् को धारण करनेवाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेज:स्वरूप भगवान् विष्णु की अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवी की भगवान् ब्रह्मा स्तुति करने लगे।
ब्रह्माजी ने कहा- देवि! तुम्हीं इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाली हो। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। तुम्हीं इस विश्व-ब्रह्माण्ड को धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत् की सृष्टि होती है। तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्प के अन्त में सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत् की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-काल में स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्त के समय संहाररूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहरूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ह्री और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शङ्ख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ- ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो-इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर-सबके परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्-असत्रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्था में तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? जो इस जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान् को भी जब तुमने निद्रा के अधीन कर दिया है, तब तुम्हारी स्तुति करने में यहाँ कौन समर्थ हो सकता है? मुझको, भगवान् शङ्कर को तथा भगवान् विष्णु को भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है? देवि! ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोह में डाल दो और जगदीश्वर भगवान् विष्णु को शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान् असुरों को मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो।

इस प्रकार स्तुति करने पर तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी योगनिद्रा भगवान् के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष:स्थल से निकलकर ब्रह्माजी के समक्ष उपस्थित हो गयीं। योगनिद्रा से मुक्त होने पर भगवान् जनार्दन उस एकार्णव के जल में शेषनाग की शय्या से जाग उठे। उन्होंने दोनों पराक्रमी असुरों को देखा जो लाल आँखें किये ब्रह्माजी को खा जाने का उद्योग कर रहे थे। तब भगवान् श्रीहरि ने दोनों के साथ पाँच हजार वर्षो तक केवल बाहुयुद्ध किया। इसके बाद महामाया ने जब दोनों असुरों को मोह में डाल दिया तो वे बलोन्मत्त होकर भगवान् से ही वर माँगने को कहा। भगवान् ने कहा कि यदि मुझ पर प्रसन्न हो तो मेरे हाथों मारे जाओ। असुरों ने कहा जहाँ पृथ्वी जल में डूबी न हो, वहीं हमारा वध करो। तब भगवान् ने तथास्तु कहकर दोनों के मस्तकों को अपनी जाँघ पर रख लिया तथा चक्र से काट डाला। इस प्रकार देवी महामाया (महाकाली) ब्रह्माजी की स्तुति करने पर प्रकट हुई। कमलजन्मा ब्रह्माजी द्वारा स्तवित महाकाली अपने दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शङ्ख धारण करती हैं। त्रिनेत्रा भगवती के समस्त अङ्ग दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं। 


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करवा चौथ की कथा :1

एक समय की बात है कि एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के किनारे के गाँव में रहतीथी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया। स्नान करते समय वहाँ एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया।वह मनुष्य करवा-करवा कह के अपनी पत्नी को पुकारने लगा।


उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागी चली आई और आकर मगर को कच्चे धागे से बाँध दिया। मगरको बाँधकर यमराज के यहाँ पहुँची और यमराज से कहने लगीहे भगवनमगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लियाहै। उस मगर को पैर पकड़ने के अपराध में आप अपने बल से नरक में ले जाओ।

यमराज बोलेअभी मगर की आयु शेष हैअतः मैं उसे नहीं मार सकता। इस पर करवा बोलीअगर आप ऐसानहीं करोगे तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूँगी। सुनकर यमराज डर गए और उस पतिव्रता करवा के साथआकर मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु दी। हे करवा माताजैसे तुमने अपने पति कीरक्षा कीवैसे सबके पतियों की रक्षा करना।
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 करवा चौथ की कथा :2

बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी।


शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।

सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो।

इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है।

वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है।

उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है।

सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।

एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से 'यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो' ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है।


इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह के वह चली जाती है।


सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है।

अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।
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