अष्टांग हृदयम में पंचगव्य (गोमूत्र , गोबर, दूध, दही, घी) से होने वाली चिकित्स्या के बारे में कई सूत्र है जिनका राजीव भाई ने विस्तार से ब्याख्या की है | बात पित्त और काफ को संतुलन करने की सबसे अच्छी दबा गोमूत्र है | "गोमय बसति लख्स्मी, गोमुत्रे धन्मंतरी" इसका मतलब गाय के गोबर में लक्ष्मी का निवास है यहाँ तक कि गाय का गोबर सबसे अच्छा खाद है और गाय के मूत्र में धन्वन्तरी का निवास है , धन्वन्तरी आरोग्य के देबता है | सर्दी जुकाम खासी डायरिया कोंस्टीपेसन जैसी बीमारियां तिन दिन से एक सप्ताह में समाप्त हो जाती है | जिन माताओं का बजन कम है वे गाय के दूध की दही में जीरे के दाने के बराबर चुना मिला कर खाएं | गाय के दूध दही व गोमूत्र सेवन से माताएं स्वस्थ व तेज बुद्धि बाले बछो को जनम देती है |

 ७ नवम्बर  यही वह दिन है जिस दिन दिल्ली में गो-भक्तों पर गोलियाँ बरसीं थीं. जिसमे अनेक लोग मारे गए थे. 

७ नवम्बर १९६६. देश में गो वध के प्रतिबन्ध की मांग को लेकर प्रदर्शन हुआ था. यह शर्मनाक बात है कि प्रदर्शनकारियो को रोकने के लिए गोलियाँ चला दी गयी. इस देश में प्रतिरोध को रोकने के लिए क्या अब गोलिया ही एक विकल्प रह गयी हैं? शर्म…शर्म…शर्म… ऐसे लोकतंत्र को नाश हो जो हिंसा के बल पर आबाद होता है. क्या भारत जैसे देश में गो वध पर प्रतिबन्ध लगाने कि मांग गलत है? महावीर, बुद्ध से लेकर गाँधी तक के इस महान देश में हिंसा ही अब स्वाद और व्यापार का जरिया बनेगी? कायदे से तो इस देश का राष्ट्रिय पशु गाय को ही घोषित किया जाना चाहिए.

जैसे तिरंगा हमारी पहचान है, जैसे हिन्दी हमारी शान है, जैसे राष्ट्रगान हमारी आन है, ठीक उसी तरह गाय हमारी जान है.
इसको बचाना है. 

प्राचीन काल से ही ऋषिमुनियों ने गाय को पूजनीय बताया है।गाय एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसके मल मूत्र तक पवित्र हैं। गाय का दूध तो रोगों में उपयोगी है ही उसका मूत्र और गोबर भी अत्यंत उपयोगी है। जो हमारे स्वास्थ्य के लिए सर्वश्रेष्ठ है। गाय के मूत्र में पोटेशियम, सोडियम, नाइट्रोजन, फास्फेट, यूरिया, यूरिक एसिड होता है। दूध देते समय गाय के मूत्र में लेक्टोज की वृद्धि होती है। जो हृदय रोगों के लिए लाभकारी है। गाय का दूध फैट रहित परंतु शक्तिशाली होता है उसे पीने से मोटापा नहीं बढ़ता तथा स्त्रियों के प्रदर रोग आदि में लाभ होता है। गाय के गोबर के कंडे से धुआं करने पर कीटाणु, मच्छर आदि भाग जाते हैं तथा दुर्गंध का नाश होता है। गाय के समीप जाने से ही संक्रामक रोग कफ सर्दी, खांसी, जुकाम का नाश हो जाता है। गोमूत्र का एक पाव रोज सुबह खाली पेट सेवन करने से कैंसर जैसा रोग भी नष्ट हो जाता है।गाय एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो ऑक्सीजन ग्रहण करता है और ऑक्सीजन ही छोड़ता है।

..............................................................................................

कौटिलीय अर्थशास्त्र में गो - पालन और गो - रक्षण का विस्तृत विवरण मिलता है। जिस भूमि में खेती न होती हो , उसे गोचर बनाने का आदेश अर्थशास्त्र का ही है। इस प्रकार गोधन ' अर्थ ' और' धर्म ' दोनों का प्रबल पोष क है। अर्थ से ही काम कामनाओं की सिद्धि होती है और धर्म से ही मोक्ष की। अतएव गोधन से अर्थ ,धर्म , काम , मोक्ष - चारों की प्राप्ति होती है। इसीलिये भारतीय जीवन में गोधन का इतना ऊँचा माहात्म्य है। जो हिंदू धर्मशास्त्र पर विश्वास रखते हैं , उन्हें चाहिये कि चतुर्वर्ग - फल - सिद्धयर्थ शास्त्रविधान के अनुसार गो सेवा करते हुए गोधन की वृद्धि करें और जो धर्मशास्त्र पर आस्था नहीं रखते , उन्हें चाहिये कि ' अर्थ ' और ' काम ' की सिद्धि के लिये अर्थशास्त्र के नियमों के अनुसार गोपालन करते हुए गोवंश की वृद्धि करने का प्रयत्न करें।

प्रल्यक्षवादियों के लिये इससे अधिक गोमाता की दयालुता हो ही क्या सकती है कि वह सूखे तृण भक्षण करके जन्म भर उन्हें दुग्ध - घृत - जैसे पौष्टिक द्रव्य प्रदान करे। इतने पर भी यदि वे गोमाता के कृतज्ञ हुए , तब तो उन में मानवता का लेश भी नहीं माना जा सकता। गोमाता के द्वारा मानवसमाज को जो लाभ है , उसे पूर्णतय व्यक्त करने के लिये सहस्रों पृष्ठों की कई पुस्तकें लिखनी होंगी। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि गोमाता से मानवसमाज को जो लाभ है , उससे मानवजाति गोमाता की सदा ऋणी रहेगी।

वध आदि हिंसक उपायोंद्वारा गोवंश का ह्रास करना धार्मिक और आर्थिक दोनों हृष्टियों से राजा - प्रजा दोनों के लिये हानिकर है। अतएव ऐसी भय्ंकर प्रथाओं को सर्वथा रोकने का प्रयत्न सभी को करना चाहिये। कई देशी रजवाड़ों ने इस सम्बन्ध में प्रशंसनीय कार्य किया है किन्तु जबतक केन्द्रीय सरकार को इसके लिये बाध्य नहीं किया जायगा , तबतक सन्तोष - जनक परिणाम असम्भव - सा प्रतीत होता है। इसके लिये देशव्यापी यथेष्ट प्रयत्न होना चाहिये।

साथ - ही - साथ प्रत्येक गृह में गोपालन की प्राचीन प्रथा को बढ़ाने का प्रयत्न भी सभी सद्गृहस्थों को करना चाहिये। तालुकेदारों , जमींदारों , सेठ - साहूकारों आदि को चाहिये कि गोशालाओं की वृद्धि करें , जहाण् से आदर्श हृष्ट - पुष्ट गौओं और बैलों की प्राप्ति हो सके। गोचर भूमि के सम्बन्ध में आज कल की व्यवस्था अत्यन्त शोचनीय है। इस सम्बन्ध में मनुजी ने लिखा है - ' प्रत्येक गाण्व और शहर के चारों ओर काफी गोचर भूमि छोड़नी चाहिये।' सभी समर्थ किसानों , जमींदारों और सेठ - साहूकारों को अपने - अपने केन्द्रों में गोचर भूमियों चाहिये। इसी में भारत और भारतीय सभ्यता का गौरव तथा सच्चा स्वार्थ निहित है। का यथोचित्र प्रबन्ध करना चाहिये। और गोधन की वृद्धि का सदैव ध्यान रखना चाहिये। इसी में भारत और भारतीय सभ्यता का गौरव तथा सच्चा स्वार्थ निहित है।

..........................................................................................................................................................................................

गाय विश्व में कमोबेश सभी देशों में पाली जाती है। लेकिन भारत में गाय गौमाता है। यहां गौ संस्कृति है। पश्चिमी दुनिया में गाय सिर्फ दूध और मांसाहार का स्रोत है। भारत में गौ कामधेनु है। इसे सब सुख प्रदा माना जाता है। लेकिन पश्चिमी दुनिया में अब मेडकाऊ रोग व्याधि के लिए जानी जाती है और जिस तरह वर्ड फ्लू के समय लाखों मुर्गियों का विनाश हुआ है,जिन देशों में गौ मांसगाय की दूध तक उपयोगिता रह गयी है,गाय के साथ वहां लगाव सिर्फ आय प्रदायक पशु से अधिक नहीं है। भारत भूमि में गाय की महिमा आदिकाल से रही है। गौ माता के संरक्षण के लिए भगवान को अवतार लेना पड़ा है। श्रीकृष्ण तो अपना शैशव और किशोरवय गौमाता के लिए समर्पित कर देते हैं।
  ऋग्वेद  में गाय को अवद्या कहा गया  है। यजुर्वेद में गौ माता न पिगतेकह कर इसे अनुपमेय बताया गया है। अथर्ववेद में गाय को धेनु:सदनम् रमीणाम कहा गया है और इसे धन संपत्ति का भंडार कहा गया है। वैदिक काल में गृहस्थ की धनाढयता गौओ में गिनी जाती थी। सामान्य श्रेणी का गृहस्थ शतगु: सौ गायों वाला होता था। हजारों गायों वाले संपन्न गृहस्थ को शहस्त्र गु: संबोधित किया जाता था। पाश्चात्य सभ्यता ने अंधानुकरण का नतीजा यह हुआ कि हम अपने सांस्कृतिक मूल्यों से दूर चले गए। गौ संपदा की अवनति के रूप में रासायनिक खादोंकीटाणु नाशकों की भरमार हुई। इसकी दुखद परिणति यह हुई कि वातावरण प्रदूषण के साथ मां के दूध तक में इक्कीस गुनाहानिकारक द्रव्य पहुंच गया है। अन्नफलसब्जियां भी प्रदूषण से प्रभावित हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस मामले में चेताया है।
      वारह सौ वर्षों की गुलामी का सबसे त्रासद परिणाम यही है कि हम भूल गये कि भारत गौ संस्कृतिकृषि ऋषि प्रधान देश है। गाय के शरीर में देवता का वास है। इस अवधारणा के पीछे अध्यात्म भले ही न खोजा जाए लेकिन इसके अर्थशास्त्र को तो अब विश्व का विज्ञान और चिकित्सा विज्ञानी भी स्वीकार कर चुके हैं। एक गाय अपने जीवनकाल में चार लाख दस हजार से अधिक व्यक्तियों के आहार उत्पादन में सहायक होती है। लेकिन पश्चिमी उपभोक्ता संस्कृति के तहत इससे अस्सी मांसाहारी ही अपनी तृप्ति पाते हैं। गौ संरक्षण के प्रति बढ़ती जिज्ञासा और सक्रियता के पीछे इसका सात्विक अर्थशास्त्रगौ उत्पादों में निहित संजीवनी शक्ति की शोध है। जिसने विश्व को चमत्कृत किया है। मजे की बात यह है कि दुनिया में गायों की जितनी नस्लें है. उनमें सर्वाधिक संजीवनी तत्व भारतीय गायों में है। जर्सी गायों में यह संजीवनी नगण्य है। जबकि दुग्ध उत्पादन क्षमता जर्सी में अधिक है। इसका अर्थशास्त्र दुग्ध उत्पादन तक सीमित है।
      गाय के उत्पादों पर जो शोध हुए हैंउससे भारत में गौ की महिमा के वे पृष्ठ खुलते जा रहे हैंजिन्हें हमने गल्प मान कर खारिज कर दिया था। अमेरिका ने गौ मूत्र का पेन्टेट नं.6410059 किया है। इसका शीर्षक है- फार्मास्युटिकल कम्पोजीशन कन्टेनिंग काऊ यूरिन,डिस्टीलेट एंड एन एन्टीबायोटिक। इससे कैंसर के उपचार में मदद ली जा रही है। रुसी वैज्ञानिक शिरोविच ने अपने शोध के परिणाम उजागर किये हैंजिनमें कहा गया है कि गाय का दूध एटामिक रेडीएशन से रक्षा करने में सर्वाधिक शक्ति रखता है।
      डॉ.जुलियसडा.ब्रुक जर्मन विज्ञानी ने कहा है कि गाय अपने निश्वास से प्राण वायु आक्सीजन छोड़ती है। पर्यावरण विज्ञानी डॉ.क्रांति सेन सर्राफ ने अपने शोध के परिणाम में बताया है कि जितना दुर्गंध वाला कचरा शहरों से निकलता हैउस पर गौ गोबर का घोल छिड़क दिया जाए तो दो फायदे होते हैंकचरा खाद में बदला जाता है और दुर्गंध समाप्त हो जाती है। गौपालन में बढती जनरुचि के संदर्र्भ में यह रोचक तथ्य है कि देश में सर्वाधिक गौपशु मध्यप्रदेश में है। उत्तरप्रदेश और बिहार में भी यह संख्या अधिक है। उपयोगिता के आधार पर तीन श्रेणियां मान ली जाती है।
दुधारू मिल्चमारवाही ड्राटद्विकाजी-डुअल परपज।  सामान्यत: देश में 27 नस्लें हैं। भारत में पायी जाने वाले सभी गौ नस्लें दूध की उत्कृष्टता की दृष्टि से यूरोपीय नस्लों से श्रेष्ठ है। आरोग्य के देवता भगवान धन्वतंरी ने उपदेश देते हुए आचार्य सुश्रुत से कहा कि गाय के शरीर में देवताओं का निवास होता है। गाय सर्वदेवमयी है। गोमय और गौमूत्र में साक्षात लक्ष्मी और गंगा का निवास है। गाय प्रेम और वात्सल्य की साक्षात मूर्ति है। इससे गाय के आयुर्वेदिकवैज्ञानिक,आध्यात्मिकसामाजिकआर्थिक सभी दृष्टिकोण से गुण सामने आते हैं। आज भौतिक युग में गाय के आर्थिक पहलुओं को जनता के सामने लाकर गौ पालन को आर्थिक दृष्टि से लाभ दायक बनाए बिना गौपालन की प्रतिष्ठा संभव नहीं हो सकती है। गाय के उत्पाद दुग्धगोमय (गोबर) और गौ मूत्र के उपयोग को आर्थिक कसौटी पर कसना होगा।
      गाय का दूधधृतमक्खनछांछ के स्वास्थ्य चिकित्सकीय पहलुओं की जानकारी  सामने लायी जाना चाहिए। आधुनिक शोध ने गौमूत्र के सेवन से रक्तचाप ठीक  होनेभूख बढ़नेकिडनी के रोग ठीक होने की बात सिध्द  कर दी है। अमेरिका का चिकित्सक  क्राकोड हेमिल्टन ने इसका प्रयोग कर सिध्द कर दिया है कि गौमूत्र के उपयोग से हृदय रोग को ठीक किया जा सकता है। डॉ.सीमर्स ने गौमूत्र से रक्त बहने वाली नलियों को अनपेक्षित कीटाणुओं से मुक्त करने की बात उजागर की है। गोमूत्र अर्क से कैंसर का इलाज करने का नुस्खा अमेरिका में पेंटेट किया गया है। इसकी पेंटेट संख्या 6410056 है।
      गोमूत्र  और गोमय (गोबर) से आयुर्वेद की औषधियांरसायनटाइल्सडिस्टेंपरकीटाणु नाशक चूर्णदंत मंजनहवन सामग्री का  औद्योगिक उत्पादन कई शहरों में आरंभ हो चुका है। इससे गौमूत्र रु. लीटर और गोबर रु. किलो खरीदे जाने का सिलसिला आरंभ हो चुका है। गौमूत्रगोबर से बनने वाले उत्पाद कुटीर उद्योग का रुप लेते जा रहे हैं। इससे रोजगार के नये अवसर पैदा हो रहे हैं।
      पंचगव्य  भारतीय समाज में सनातन काल से चला आ रहा है। इसका प्रतीकात्मक  उपयोग देखते आ रहे हैं। इसके  चिकित्सकीय गुणों का आकलन कर जन-जन के सामने लाने का वक्त आ गया है। पंच गव्यदेहमनबुध्दि को शुध्द करता है।
      आजादी के पहले महात्मा गांधी ने कहा  था कि आजादी प्राप्त होने पर पहला काम देश में गौ वध पर प्रतिबंध लगाना  होगा। लेकिन राय सरकारों ने गौवंश के वध पर प्रतिबंध लगाने की  पहल की है। जब तक केन्द्रीय कानून नहीं बनताइस पर समग्र रोक  संभव नहीं हो पाएगी। विडंबना की बात है कि भारत में गौवंश की हत्या ने उद्योग की रूप हासिल कर लिया है। एक ओर गौ वंश का क्षरण हो रहा हैदूसरी ओर देश में पोषक आहार का संकट गहराता जा रहा है। गौपालन के प्रति निरुत्साहित होने के पीचे गौपालन का अलाभकारी हो जाना है। इसे आर्थिक आधार देना होगा। इसके लिए गौ उत्पादों का व्यावसायीकरण करना होगा। पंचगव्य की महिमा को प्रामाणिकता के साथ जन-जन तक पहुंचाना सामयिक आवश्यकता है। पंचगव्य गौ दुधगौ दही,गौ धृतगोमय और गौ मूत्र के लिए स्वदेश गाय की नस्ल की जरूरत पड़ेगी। देशी गाय के दूध में अन्य रसायनों के साथ जो लवणधातुएँ हैंउनमें सोना भी है। गाय के पचास किलोग्राम दुध में एक ग्राम सोना की मात्रा होती है। यही वे तत्व हैं जो मानव जीवन को स्वास्थ्यदीर्घ आयु,तेजओज प्रदान करते हैं। गाय के दूध में प्राप्त स्वर्णतत्व अन्यत्र दुर्लभ है। इससे गौपालन और पंचगव्य के गुणकारी होने का प्रमाण मिलता है।
 

............................................................................................................................................................................................................... 

कृषि, खाद्य, औषधि और उद्योगों का हिस्सा के कारण पर्यावरण की बेहतरी में गाय का बड़ा योगदान है । प्राचीन ग्रंथ बताते हैं कि गाय की पीठ पर के सूर्यकेतु स्नायु हानिकारक विकीरण को रोख कर वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं । गाय की उपस्थिति मात्र पर्यावरण के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान है । भारत में करीब ३० करोड़ मवेशी हैं । बायो-गैस के उत्पादन में उनके गोबर का प्रयोग कर हम ६ करोड़ टन ईंधन योग्य लकड़ी प्रतिवर्ष बचा सकते हैं । इससे वनक्षय उस हद तक रुकेगा । गोबर का पर्यावरण की रक्षा में महत्वपूर्ण भाग है । गोबर के जलन से वातावरण का तापमान संतुलित होता है और वायु के कीटाणुओं का नाश । गोबर में विष, विकिरण और उष्मा के प्रतिरोध की क्षमता होती है । जब हम दीवारों पर गोबर पोतते हैं और फर्श को गोबर से साफ करते हैं तो रहनेवालों की रक्षा होती है । १९८४ में भोपाल में गैस लीक से २०,००० से अधिक लोग मरे । गोबर पुती दीवारों वाले घरों में रहने वालों पर असर नहीं हुआ । रूस और भारत के आणविक शक्ति केंद्रों में विकीरण के बचाव हेतु आज भी गोबर प्रयुक्त होता है । गोबर से अफ्रीकी मरूभूमि को उपजाऊ बनाया गया । गोबर के प्रयोग द्वारा हम पानी में तेजाब की मात्रा घटा सकते हैं । जब हम संस्कार कर्मों में घी का प्रयोग करते है तो ओजोन की परत मजबूत होती है और पृथ्वी हानिकारक सौर विकिरण से बचती है । बढ़ते हुए कल्लगाहों और भूकंपों के बीच का संबंध प्रमाणित होता जा रहा है ।


 
Make a Free Website with Yola.