शस्त्र द्वारा रक्षित राष्ट्र में ही शास्त्रचर्चा हो सकती है शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचर्चा प्रवर्तते.. यह सूत्रवाक्य आज के समय की मांग है.. यह सम-सामयिक ही नहीं, अपितु एक सार्वकालिक और सार्वभौमिक सत्य है.. वीरभोग्या वसुन्धरा.. शक्ति द्वारा श्रेयस् की प्राप्ति होती है.. शक्ति और श्रेयस् एक दूसरे के पूरक ही नहीं, एक दूसरे पर अवलम्बित भी हैं। शस्त्र में और शास्त्र विभाजक रेखा खींचने वाले लोग व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के सर्वतोमुखी विकास में कभी सफल नहीं हो सकते...परशुरा म इसके सटीक उदाहरण हैं और सनातन धर्म में तो शक्ति ब्रह्म की भी कही गयी है ...कृष्ण शक्ति के साथ अर्जुन शक्ति भी अनिवार्य है.. योद्धा अर्जुन के गांडीव के बिना योगेश्वर कृष्ण के कर्मयोग के उपदेश-तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चयः और युद्धाय युज्यस्व का कोई अर्थ नहीं.. अन्याय, अत्याचार, अधर्म, उत्पीड़न का प्रतिरोध करके न्याय और धर्म की विजय के लिए अर्जुन की गांडीव-शक्ति अनिवार्य और अपरिहार्य है.. जब-जब इस तथ्य की उपेक्षा हुई हम पराजित हुए, अपमानित हुए, पीड़ित और प्रताड़ित हुए.. "अहिंसा परमो धर्मः' वैदिक धर्म में अभिप्रेत नहींहै.. यह तो अन्याय और अत्याचार को प्रश्रय देना है.. अहिंसा निरपवाद नहीं.. मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र द्वारा दानव-कुल का हनन करके रामराज्य की स्थापना तथा योगीराज श्रीकृष्ण द्वारा कंस-शिशुपाल-जरासन्ध का वध करके न्याय की स्थापना की संगति अहिंसा से नहीं बैठतीऔर गीता में श्रीकृष्ण का "विनाशाय च दुष्कृताम्' का प्रण भी असंगत हो जाता है.. अग्रतः चतुरो वेदान्ः पृष्ठत सशरं धनुः....इदं शास्त्रमिदं शस्त्रं शापादपि, शरादपि...सामने चारों वेदों हों, पीठ पर बाण सहित धनुष हो, यह (इधर) शास्त्र हो, यह (इधर) शस्त्र हो, तर्क से भी, तीर से भी। ब्राह्म तेज के साथ क्षात्र तेज भी आवश्यक है.. राष्ट्र की अस्मिता (संस्कृति, कला, साहित्य, भाषा) की रक्षा हेतु देशवासियों को सर्वतः सन्नद्ध रहना होगा.. याद रहे, राष्ट्र-द्रोह से बढ़कर कोई बड़ा पाप या अपराध नहीं.. राष्ट्र-रक्षा के संकल्प से बढ़कर कोई संकल्प बड़ा नहीं.
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परशुराम जी वैदिक और पौराणिक इतिहास के सबसे कठिन और व्यापक चरित्र हैं। उनका वर्णन सतयुग के समापन से कलियुग के प्रारंभ तक मिलता हैं। इतना लंबा चरित्र, इतना लंबा जीवन किसी और ऋषि, देवता या अवतार का नहीं मिलता। वे चिरंजीवियों में भी चिंरजीवी है। उनकी तेजस्विता और ओजस्विता के सामने कोई नहीं टिका। न शास्त्रास्त्र मे और न शस्त्र-अस्त्र में। उनके आगे चारो वेद चलते थे, और पीछे तीरों से भरा तूरीण रहता था। वे शाप देने और दंड देने दोनों में समर्थ थे। वे शक्ति और ज्ञान के अद्भुत पुंज थे। वे ही गणनायक गणेश को एकदंत करने वाले हैं। उन्हीं ने दशरथिराम की परीक्षा लेकर रामत्व प्रदान किया और उन्हीं ने कृष्ण को चक्र देकर अवतार की मान्यता प्रदान की। संसार में ऐसा कोई वंश नहीं, कोई धार्मिक या आध्यात्मिक परंपरा नहीं जिसका सूत्र परशुराम जी तक न जाता हो समस्त परंपराएं और साम्प्रदाय मानों उन्हीं से प्रारंभ होते हैं। लेकिन परशुराम जी जितने व्यापक है, इतिहास और पुराणो की पुस्तकों में उतने ही दुर्लभ।उनका विवरण कहीं एक साथ नहीं मिलता। वे सब जगह हैं, और कहीं भी नहीं। परशुराम जी को समझने के लिए अनेक प्रसंगो से कड़िया जोड़नी पड़ती है।
एशिया के सौ से अधिक स्थानों पर परशुराम जी के जन्मस्थान होने की मान्यता है। मध्य एशिया में फिलस्तीन की राजधानी रामल्ला या अफगानिस्तान का जामदार उन्हीं मे से हैं। कभी संपूर्ण एशिया कुल चार साम्रायों में विभाजित था। जिसके बारे में कहा जाता है कि इन साम्रायों का सीमांकन परशुरामजी के कहने से महर्षि कश्यप ने किया था। इसकी पुष्टि भाषा विज्ञान से की जा सकती है। संसार का सुप्रसिध्द पारस साम्राय जिसका अस्तित्व ईसा से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व यूनानी विजेता सिंकदर के समय तक मौजूद था। पारस साम्राय का शब्द च्पारस और परशुराम जी के नाम में जुड़ा शब्द च्परशु एक ही धातु के बने शब्द है। परशुराम जी को बचपन में उनकी मां रेणुका देवी अभिराम कहा करती थी। वे परशुराम तो बाद में परशु अस्त्र के अविष्कार के बाद बने। हो सकता है वायबल के हजरत अब्राहम और च्अभिरामच् एक ही हों। चूंकि हजरत अब्राहम का जन्म यरूस्लम में हुआ था और यरूस्लम मूल संस्कृत का शब्द है। लेकिन इन घटनाओं को अब हजारों और लाखो वर्ष बीत गए है। इनका दस्तावेजी प्रमाण कहीं नही मिलेगा इन्हें भाषाओं और शब्दों की यात्रा से ही सुलझाया जा सकता है। वह भी केवल संभावनाओं की सीमा तक ही। हो सकता है ऐसा हो, हो सकता हैं ऐसा न हो। आज के भारत में लगभग 28 स्थान ऐसे है जिनके बारे में मान्यता है कि वे परशुराम जी की जन्म स्थली है।
मध्यप्रदेश में ही दो स्थान हैं। एक भिण्ड जिले में जमदारा और दूसरा इंदौर जिले में महू के समीप बाम्बे आगरा रोड पर स्थित जानापाव। इसके अतिरिक्त सिंधु नदी के किनारे परशुराम सरोवर, उ.प्र. में तीन, राजस्थान दो, गुजराज में दो, महाराष्ट्र में तीन सहित दक्षिण भारत में भी परशुराम जन्म स्थलियां मिलती है। इतनी अधिक जन्मस्थलियों के प्रश्न का समाधान यह है कि संभवत परशुराम नामी पीठ की स्थापना हो गई होगी। जिस प्रकार इन्द्र एक उपाधि थी। मनु एक उपाधि थी, उसी प्रकार पीठ के कारण परशुराम नामी इस पीठ को पीठाधीश को परशुरामजी के नाम से ही संबोधित किया जाता हो। जैसा आज शंकराचार्य जी की पीठ है। परशुराम जी और क्षत्रिय :- परशुराम जी ऋषियों के ओज और ऋषियों के तेज दोनों का अद्भुत संगम थे। उनके दादा महर्षि ऋचीक महान भृगु परंपरा के वाहक थे तो दादी सुप्रसिदकण् चन्द्रवंशी कान्यकुब्ज के नरेश गाधि की सुपुत्री और संसार प्रसिध्द विश्वामित्र की सगी बहिन सत्यवती थी तो पिता महर्षि नमदाग्नि और माता इतिहास प्रसिदकण् इक्ष्वाकुवंशी सम्राट प्रसेनजित की पुत्री देवी रेणुका थी इस प्रकार ऋषियों की सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी दोनों शाखाओं से परशुरामजी का रक्त संबंध था। क्षत्रियों में परशुरामजी का रक्त संबंध केवल अपनी मां अथवा दादी के कारण ही नहीं अपितु परशुरामजी की वंश परंपरा की अनेक कन्याएं क्षत्रियों को ब्याही थी। परशुराम जी भार्गव-ऋषि परंपरा में जन्में थे। इस वंश परंपरा के आदि ऋषि महर्षि भृगु की पौत्री देवयानी जो महर्षि शुक्राचार्य की बेटी थी, चन्द्रवंशी सम्राट राजा ययाति को ब्याही थी, देवयानी की कोख से उत्पन्न चार पुत्रों से ही चन्द्रवंशी क्षत्रियों के यदु, पुरू, कुरू आदि चार गौत्र चले। महर्षि विश्वामित्र जो परशुराम जी के पिता महर्षि जमदाग्नि के सगे मामा थे, से कुल आठ गौत्र चले इनमें चार ब्राह्मणों के और चार क्षत्रियों के थे।
परशुराम जी के प्रथम गुरू महर्षि विश्वामित्र ही थे, जिन्होंने परशुराम जी को बचपन में शस्त्र संचालन की शिक्षा दी थी, महर्षि विश्वामित्र जी ने परशुराम जी को यह शिक्षा तब दी थी, जब विश्वामित्र महर्षि नही बने थे, वे तब तक गद्दी पर भी नही बैठे थे, केवल युवराज थे। कहने का आशय यह है कि परशुराम जी की वंश परम्परा में ब्राह्मणों और क्षत्रियों में कोई भेद नहीं था। उनकी कुल परंपरा में ऋषियों और राजकन्याओं के बीच इतने विवाह संबंध स्थापित हुए कि यह वर्गीकरण करना मुश्किल है कि कौन ब्राह्मण था और कौन क्षत्रिय। बावजूद इसके कुछ लोग यह प्रचार करते हैं कि परशुराम जी ने कोई क्षत्रियों के विरूध्द अभियान छेड़ा और धरती को क्षत्रिय विहीन करने का संकल्प लिया। यह प्रचार एकदम असत्य, झूठ और भारतीय समाज में वैमनस्य पैदा करने वाला हैं। इसके पीछे वे लोग हैं जो भारतीय समाज में व्यक्तिगत बैर वैमनस्य उत्पन्न करके अपनी राजनैतिक अथवा धार्मिक सत्ता स्थापित करना चाहते हैं। जिस काल में परशुरामजी धरती पर आए तब तक जातियों का वर्गीकरण जन्म के आधार पर था ही नहीं। विभाजन व्यक्ति के आधार पर नहीं अपितु कार्य के आधार पर था। इस बात को भगवान कृष्ण ने गीता में बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा हैं।
महाभारत काल में महर्षि पाराशर और निषाद कन्या से जन्में महर्षि व्यास ब्राह्मण हैं तो व्यास जी और क्षत्रिय कन्याओं से जन्में धृतराष्ट्र एवं पाण्डु क्षत्रिय माने गए तो व्यास जी और शूद्र कन्या से जन्में विदुर की गणना ब्राह्मणों में होती हैं। वर्ण विभाजन की यह स्थिति महाभारत काल में है जबकि भगवान परशुरामजी महाभारत काल से बहुत पहले जन्में थे। तब ब्राह्मण और क्षत्रियों का भेद करना मुश्किल था। पुराणों में ऐसे उदाहरण हैं कि पिता ब्राह्मण और पुत्र क्षत्रिय। वनप्रस्थ की परंपरा से अनुमान लगाया जा सकता है कि एक ही व्यक्ति अपने जीवन के किसी भी वर्ण में हो में जो भी हो लेकिन वह वनप्रस्थ और सन्यास के बाद अपनी गणना ब्राह्मणों में करा सकता है यह इसी परंपरा का अवशेष है कि आज कितने ही सन्यासी अ-ब्राह्मण है। महासंग्राम-सहस्रबाहु अर्जुन से :-यह ठीक है कि परशुराम जी ने चन्द्रवंशी क्षत्रियों की हैहय शाखा में जन्में सहस्रबाहु अर्जुन के विरूध्द महा अभियान छेड़ा। सहस्रबाहु अर्जुन महाप्रतापी राजा रहे हैं। नर्मदा नदी के नीचे दक्षिण तक उनका साम्राय फैला था। परशुराम जी के पिता और उनके पूर्वज हैहयों के कुल गुरू रहे हैं। हैहयों की राज-सीमा में भार्गवों का बड़ा प्रभुत्व था। उनके आश्रम शस्त्र और शास्त्र दोनों शिक्षाओं का केन्द्र थे। आश्रम इतने संपन्न कि अनेक बार संकट के समय आश्रमों से राजकोष को आर्थिक सहायता दी गई और आश्रम के ब्रह्मचारियों ने राजा के पक्ष में युध्द भी किए। लेकिन किसी बात पर राजकुल और राजगुरू में ठन गई। कुछ पुस्तकों में इसका कारण आर्य सम्राट राजा सुदास की पुत्री देवी लोमहर्षिणी को मानते है तो कुछ पुस्तकों में इस विवाद का कारण भार्गव आश्रम की संपदा और कामधेनु गाय को माना जाता है जिसे सम्राट सहस्रबाहु अर्जुन प्राप्त करना चाहते थे। जब बात शांति से नहीं बनी तो आश्रम में सेना ने प्रवेश किया। अकेला महर्षि जमदाग्नि का आश्रम ही नहीं अपितु उनके शिष्य परंपरा के तमाम ऋषि आश्रम उजाड़ दिए गए। सैकड़ो हजारो ब्रह्मचारी या तो मार डाले गए अथवा साम्राय की सीमा से बाहर भगा दिये गए।
इसी संघर्ष में महर्षि जमदाग्नि और देवी रेणुका की हत्या की गई। यह इतना बड़ा घटना क्रम था कि संपूर्ण भारत स्तब्ध रह गया। सहस्रबाहु अर्जुन ने दो ताकतों से एक साथ संघर्ष मोल लिया था। एक तो भार्गवों की प्रचण्ड शक्ति से और दूसरे सूर्यवंशी इश्वाकुओं का सैन्य बल से चूंकि देवी रेणुका इसी वंश की पुत्री थी। यह सब जब आनर्त में हो रहा था तब परशुराम जी ननिहाल में थे। उनका भी रक्त खौल गया। उनके क्रोध से मानों धरती कांप गई। उन्होंने अपने नाना की सहायता से संसार भर के राजाओं और आश्रमों से संपर्क किया। सहस्रबाहु अर्जुन साधारण सम्राट नही था। उसकी सेनाएं उत्तर में यदि आर्यावत्त, ब्रह्र्मवत्त और महोदय रायों को रौंध चुकी थी तो दक्षिण में आन्ध्रा अंचल (आजकल का आस्ट्रेलिया) तक उसकी ध्वजा घूम चुकी थी फिर भी अपने कुल-गुरू और कुल गुरूमाता की हत्या ने पूरे राष्ट्र को झकझौर दिया था। यह उसके दंभ और स्वेच्छा चारिता की पराकाष्ठा थी, जनमत उसके विरूध्द हो गया। परशुराम जी की कमान में संसार भर की सेनाएं आ जुटी। सहस्रबाहु अर्जुन के सगे चाचा नरसिंह हैहय जिनका राय नर्मदा और अवंतिका के बीच संभवत धार या इसके आसपास का कोई नगर रहा होगा, अपने भतीजे के विरूध्द परशुरामजी के साथ आए। सहस्रबाहु के स्वसुर विदर्भ के शर्यात नरेश अपने दामाद के बजाए परशुरामजी की कमान में जमा हुए। आश्रम के ब्रह्मचारियों ने शास्त्र छोड़कर शस्त्र उठाए और यह महायुध्द हुआ। इसमें उन तमाम लोंगो को प्राण दंड दिया गया जो आश्रमों को उजाड़े जाने के अभियान का हिस्सा थे अथवा बाद में इस धर्मयुध्द में स्वेच्छाचारी सहस्रबाहु के साथ थे। इस युध्द की समाप्ति के बाद परशुराम जी ने किसी राय पर कब्जा नहीं किया। उन्होंने आनर्त का उत्तराधिकारी सहस्रबाहु के पुत्र को ही घोषित किया। सहस्त्रवाहु का यह वही पुत्र था जिसके नाना परशुरामजी कमान थे।
इस महायुदकण् में सहस्रबाहु की कमान में कुल 21 राजा शामिल हुए वे सब मारे गए। पुराणों मं क्षत्रप शब्द का प्रयोग है जो आगे चलकर क्षत्रिय हो गया। यह संघर्ष राजाओं की स्वेच्छा चारिता के विरुध्द था। इस युध्द के बाद परशुरामजी एक ऐसी शक्ति के रूप में सामने आते हैं जो राजाओं पर अंकुश लगाती है। वे सही मायने में जनवादी थे और सशस्त्र क्रांति के नायक भी।
........................................................................................................................................................ ब्राह्मणत्व क्या है?
ब्राह्मण के प्रथम छह कर्म-वेद पढ़ना और वेद पढ़ाना यज्ञ करना और यज्ञ करवाना दान लेना और दान देना ब्राह्मण के नौ गुण -सम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिकता ब्राह्मण के सोलह संस्कार :१. ऋतु स्नान, २. गर्भाधान, ३. सुती स्नान, ४. चंद्रबल, ५. स्तन पान, ६. नामकरण, ७. जात कर्म, ८. अन्नप्राशन, ९. तांबूल भक्षणम, १०. कर्ण भेद (कान छेदना), ११. चूड़ाकर्म, १२. मुंडन, १३. अक्षर आरंभ, १४. व्रत बंद (यज्ञोपवीत), १५. विद्यारंभ और १६ विवाह | ब्राह्मण ही ब्रह्म को जानता है? ब्रह्म ज्ञान की उत्पत्ति वैदिक मंत्रों के मंथन से ही होगी अन्यथा पूर्ण सृष्टि में ब्रह्म ज्ञान उत्पन्न करनेवाला कोई यंत्र न बन और न बन पाएगा | इसका उदाहरण हमें लंकाधिपति रावण की जीवन शैली को पढ़ा जाए तो ही हमें पूर्ण रूप से ब्राह्मण की व्याख्या के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है | लंकाधिपति रावणजी उस समय सोलह वर्ष की आयु में जो सतयुग का समय था पृथ्वी पर उसी समय से अपनी संगत में परमात्मा शिव के आधीन रहे | उन्होंने परमात्मा की इच्छा अनुसार अपने पूर्ण आयु का संकल्पित जीवन व्यतीत किया | जिसका आभास हमें आज कलयुग में हो रहा है कि पृथ्वी पर से पूर्ण राक्षस अंश की समाप्ति हो गई | उस समय परमात्मा स्थूल शरीर में होने के कारण उन्होंने रावण को पूर्ण सृष्टि के क्रूर रहस्य समझाए | उत्तम कुल पुलस्त कर नाती शिवविरंचपूज्यहुजेही भातीब्राह्मणता के कर्मों की चर्चा करें तो रावण के जीवन से इस बात का अनुभव होता भी है कि पूर्ण रूप से अपने ज्ञान द्वारा अनेकानेक शिव साधनों को संपन्न कर मानव कल्याण के लिए अनेक मार्ग प्रशस्त किए हैं | सबसे उत्तम रचना शिव तांडव स्तोत्र की है जिसके उच्चारण करने से पूर्ण शरीर के चक्र अति तीव्र गति पकड़ते हैं | कुंडलिनी चक्रों की जितनी गति तीव्र होगी उतनी ही शरीर में चक्र द्वारा ऊर्जा अंग को प्राप्त होगी | मानव शरीर में उसकी सीधी बुद्धि की सोच ही उसे सुखी कर पाएगी इसलिए इस स्तोत्र के उच्चारण मात्र से ही मानव की बुद्धि का विशेष सुख देनेवाला हिस्सा पूर्ण रूप से सक्रिय हो जाता है |आज कलयुग के समय में अगर हम मानव पर दृष्टि डालते हैं तो हमें मानव में अनेक बदलाव नजर आते हैं | सतयुग का समय१. भोजन - कंदमूल (सात्विक) २. कर्म - प्रबल मन की समझ अनुसार ३. गुण - कल्याणकारक गुणो से लैश ४. भाव - देव भावनाएं ५. संस्कार - पूर्ण रूप से वैदिक कलयुग का समयमांस, अनाज (तामसिक, सात्विक), निर्बल मन की समझ अनुसार, विनाश कारक गुणों से लैश, राक्षस भावनाएं, पूर्ण रूप से आधुनिकपूर्ण रूप से आज के कलयुग के समय में मानव यंत्रवादी ही हो चुका है | मानव के मन की समझ अति निर्बल हो चुकी है | मानव अपनी बुद्धि का उलटा भाग अधिक सक्रिय करके बैठा है | पूर्ण रूप से ज्ञान न होने के कारण इस सृष्टि चक्र में फंसा हुआ है | विनाश और कल्याण के अंतर की दूरी को पहचानने में असमर्थ हो चुका है | सृष्टि में परमात्मा के समक्ष विकल्पित जीवन व्यापन कर रहा है | मानव के शरीर में इन सारे लक्षणों की उत्पत्ति केवल वैदिक मंत्रों से दूर हो जाने से हो गई और कुछ खान-पान के बदलाव का भी असर उसके शरीर पर पड़ा है | प्रत्येक मानव को समझने हेतु परमात्मा ने मानव शरीर की व्याख्या इस प्रकार से की है | ब्राह्मणोस्य मुखमासीद्बाहु राजन्न्य ट कृत अ॥ उरू तदस्य यद्वैश्व ट पदब्भ्या ए. शूद्रो अजायत॥अगर हम गहराई से देखें तो परमात्मा ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति मुख से ब्राह्मण, बाहुओं से क्षत्रिय, उरू से वैश्य और पांव से शूद्र है | इस दृष्टिकोण से भी प्रत्येक मानव शरीर को परमात्मा से लिए सृष्टि कल्याण के अपने संकल्प के ज्ञान हेतु शिव संकल्पमस्तु के ही मंत्रों का मंथन करना ही पड़ता है इसलिए वैदिक मंत्रों की स्थापना मानव को अपने मन में करनी परम आवश्यक है | मानव के पास सनातन बोलने हेतु केवल चार वेद ही हैं क्योंकि सनातन वो वस्तु मानी जाती है जो पिता द्वारा दी गई हो | मानव का धर्म तो सनातन धर्म ही होना चाहिए | मानव को बुरे, उलटे और पाप कर्मों से बचना है और अपने जीवन को सुखी और संकल्पित बनाना है तो इन वैदिक मंत्रों का मंथन करना ही पड़ेगा अन्यथा पूर्ण विश्व के पास और कोई मार्ग ही नहीं है | वैदिक मंत्रों का उच्चारण केवल किसी ब्राह्मण की आय का साधन कदापि नहीं है | परमात्मा से प्रत्येक मानव जुड़ा होने के कारण और उसका अंश होने के कारण मानव का यह परम कर्तव्य भी बनता है कि परमात्मा द्वारा दिए गए संकल्प को पूर्ण करे | कलयुग के समय में मनव को परम आवश्यकता है कि ऊर्जावान और कंदमूल अधिक ग्रहण करे, क्योंकि मानव शरीर में उचित धातुओं की मात्रा अधिक होनी चाहिए | धातु जितने भी हैं वो सभी हमें कंदमूल द्वारा ही प्राप्त होते हैं | आज का मानव मन इस ज्ञान से भी दूर है कि वो मोटरगाड़ी जैसे यंत्रों को चलाकर सृष्टि विनाश का पाप कर्म अपने शरीर से संपन्न करता जा रहा है जिसके परिणामस्रूप जीवात्मा अगर यज्ञ जैसा पवित्र और पुण्य का कर्म संपन्न करता है तो ही वो मोक्ष अथवा अमरत्व ज्योति का अधिकारी बन भी पाता है | आज के कलयुग के समय में पूर्ण सृष्टि को जौ चावल के यज्ञ की आवश्यकता है क्योंकि मानव द्वारा तीन सौ सालों में इस्तेमाल किए गए यंत्रों से पूर्ण पृथ्वी का वायुमंडल गरमा चुका है और पृथ्वी महाविनाश की कगार पर ही खड़ी है | यज्ञ के अलावा मानव के पास और कोई मार्ग ही नहीं है अपने वायु मंडल को ठंडा करने हेतु | मानव अनेक प्रकार से वायुमंडल को गरमा रहा है | मानव अपनी सभी प्रकार की उपयोगी वस्तुओं को ज्वलनशील पदार्थ प्लास्टिक पैकिंग में ही इस्तेमाल कर रहा है, जिसका कूड़ा जलने के पश्चात वही काम करता है जो मोटरगाड़ियों का धुआं करता है | सृष्टि के कल्याण हेतु प्रत्येक मानव को यज्ञ करना होगा और विनाशकारी कर्मों से दूर रहना होगा |
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