कितनी तरह के होते हैं तिलक--सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं। शैव- शैव परंपरा में ललाट पर चंदन की आड़ी रेखा या त्रिपुंड लगाया जाता है। शाक्त- शाक्त सिंदूर का तिलक लगाते हैं। सिंदूर उग्रता का प्रतीक है। यह साधक की शक्ति या तेज बढ़ाने में सहायक माना जाता है। वैष्णव- वैष्णव परंपरा में चौंसठ प्रकार के तिलक बताए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं- लालश्री तिलक-इसमें आसपास चंदन की व बीच में कुंकुम या हल्दी की खड़ी रेखा बनी होती है। विष्णुस्वामी तिलक- यह तिलक माथे पर दो चौड़ी खड़ी रेखाओं से बनता है। यह तिलक संकरा होते हुए भोहों के बीच तक आता है। रामानंद तिलक- विष्णुस्वामी तिलक के बीच में कुंकुम से खड़ी रेखा देने से रामानंदी तिलक बनता है। श्यामश्री तिलक- इसे कृष्ण उपासक वैष्णव लगाते हैं। इसमें आसपास गोपीचंदन की तथा बीच में काले रंग की मोटी खड़ी रेखा होती है। अन्य तिलक- गाणपत्य, तांत्रिक, कापालिक आदि के भिन्न तिलक होते हैं। साधु व संन्यासी भस्म का तिलक लगाते हैं।
तिलक धारण- प्रकार गङ्गा, मृत्तिका या गोपी-चन्दन से ऊर्ध्वपुण्ड्र, भस्म से त्रिपुण्ड्र और श्रीखण्ड चन्दन से दोनो प्रकार का तिलक कर सकते है । किंतु उत्सवकी रात्रि में सर्वाङ्ग में चन्दन लगाना चाहिये ।
भस्मादि-तिलक-विधि तिलक के बिना सत्कर्म सफल नही हो पाते । तिलक बैठकर लगाना चाहिये । अपने-अपने आचार के अनुसार मिट्टी, चन्दन और भस्म- इनमे से किसी के द्वारा तिलक लगाना चाहिये । किंतु भगवान पर चढ़ाने से बचे हुए चन्दन को ही लगाना चाहिये । अपने लिये न घिसें । अँगूठे से नीचे से ऊपर की ओर ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाकर तब त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिये । दोपहर से पहले जल मिला कर भस्म लगाना चाहिये । दोपहर के बाद जल न मिलावे । मध्याह्न मे चन्दन मिलाकर और शाम को सूखा ही भस्म लगाना चाहिये । जल से भी तिलक लगाया जाता है ।
अँगूठे से ऊर्ध्वपुण्ड्र करने के बाद मध्यमा और अनामिका से बायी ओर से प्रारम्भ कर दाहिनी ओर भस्म लगावे । इसके बाद अँगूठे से दाहिनी ओर से प्रारम्भ कर बायी ओर लगावे । इस प्रकार तीन रेखाएँ खिंच जाती है । तीनों अँगुलियों के मध्यका स्थान रिक्त रखे । नेत्र रेखाओं कि सीमा है, अर्थात बाये नेत्र से दाहिने नेत्र तक ही भस्म की रेखाएँ हो । इससे अधिक लम्बी और छोटी होना भी हानिकर है । इस प्रकार रेखाओं की लम्बाई छः अंगुल होती है ।
(क) भस्म का अभिमन्त्रण - भस्म लगाने से पहले भस्म को अभिमन्त्रित कर लेना चाहिये । भस्म को बायी हथेली पर रखकर जलादि मिलाकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़े - ॐ अग्निरिति भस्म । ॐ वायुरिति भस्म । ॐ जलमिति भस्म । ॐ स्थलमिति भस्म । ॐ व्योमेति भस्म । ॐ सर्वं ह वा इदं भस्म । ॐ मन एतानि चक्षूंषि भस्मानीति ।
(ख) भस्म लगाने का मन्त्र - इसके बाद 'ॐ नमः शिवाय' मन्त्र बोलते हुए ललाट, ग्रीवा, भुजाओं और ह्रदय में भस्म लगाये, अथवा निम्नलिखित भिन्न-भिन मन्त्र बोलते हुए भिन्न-भिन्न स्थानोंमे भस्म लगाये - ॐ त्र्यायुषं जमदग्नोरिति ललाटे । ॐ कश्यपस्य त्र्यायुषमिति ग्रीवायाम् । ॐ यद्देवेषु त्र्यायुषमिति भुजायाम् । ॐ तन्नो अस्तु त्र्यायुषमित ह्रदये । =================
ललाट पर तिलक की परंपरा
हमारी संस्कृति में किसी भी पूजा, पाठ, यज्ञ, अनुष्ठान आदि का शुभारंभ श्रीगणेश पूजा से आरंभ होता है। उसी प्रकार बिना तिलक धारण किए कोई भी पूजा-प्रार्थना आरंभ नहीं होती। धर्म मान्यतानुसार सूने मस्तक को अशुभ और असुरक्षित माना जाता है। तिलक चंदन, रोली, कुंकुम, सिंदूर तथा भस्म का लगाया जाता है। तंत्रशास्त्र में तिलक की अनेक क्रिया-विधियां विभिन्न कार्यों की सफलता के लिए बताई गई हैं।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कालपुरूष की गणना प्रथम राशि मेष से की गई है। महर्षि पराशर के सिद्धांत के अनुसार कालपुरूष के मस्तक वाले स्थान में मेष राशि स्थित है। जिसका स्वामी मंगल ग्रह सिंदूरी लाल रंग का अधिष्ठाता है। सिंदूरी लाल रंग राशि पथ की मेष राशि का ही रंग है। इसीलिए इस रंग (लाल रोली या सिंदूर) का तिलक मेष राशि वाले स्थान (मस्तक) पर लगाया जाता है। तिलक लगाने में सहायक हाथ की अंगुलियों का भी भिन्न-भिन्न महत्व बताया है।
तिलक धारण करने में अनामिका अंगुली शांति प्रदान करती है। मघ्यमा अंगुली मनुष्य की आयु वृद्धि करती है। अंगूठा प्रभाव और ख्याति तथा आरोग्य प्रदान कराता है। इसीलिए राजतिलक अथवा विजय तिलक अंगूठे से ही करने की परंपरा रही है। तर्जनी मोक्ष देने वाली अंगुली है। सामुद्रिकशास्त्र के अनुसार भी अनामिका तथा अंगूठा तिलक करने में सदा शुभ माने गए हैं। अनामिका सूर्य पर्वत की अधिष्ठाता अंगुली है। यह अंगुली सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका तात्पर्य यही है कि सूर्य के समान, दृढ़ता, तेजस्व, प्रभाव, सम्मान, सूर्य जैसी निष्ठा-प्रतिष्ठा बनी रहे। दूसरा अंगूठा है जो हाथ में शुक्र क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र ग्रह जीवन शक्ति का प्रतीक है। संजीवनी विद्या का प्रणेता तथा जीवन में सौम्यता, सुख-साधन तथा काम-शक्ति देने वाला शुक्र ही संसार का रचयिता है।
"तिलक" का विज्ञान एवं दर्शन
हिंदू परंपरा में मस्तक पर तिलक या टिका लगाना धार्मिक कृत्यों के साथ जुड़ा हुआ है। प्रत्येक शुभ अवसर पर ऐसा करना प्रसन्नता का, सात्विकता का, सफलता का चिन्ह माना जाता है। किसी महत्वपूर्ण कार्य या विजय अभियान में निकलने पर रोली, हल्दी, चंदन या कुंकुम का तिलक लगाया जाता है। तीर्थो में देवदर्शन हेतु उपस्थित होने पर वहाँ माथे पर तिलक लगाकर शुभकामना दी जाती है।
भारतीय संस्कृति में कर्मकाड़ों , परंपराओं, प्रथाओं को विनिर्मित करने वाले हमारे प्राचिन ऋषि एक साथ वैज्ञानिक भी थे और महान् दार्शनिक भी थे। इसलिए किसी भी शुभ प्रचलन की स्थापना में उन्होनें इन दोंनो दृष्टियों को ध्यान में रखा, ताकि कोई एक पक्ष सर्वथा उपेक्षित न पड़ा रहे एवं दूसरे के दुरुपयोग की संभावना न बढ़ जाये। इसके पीछे संतुलन-समीकरण का प्रायोजन ही प्रमुख था, जिससे दोनों वर्ग के अनुयायी संतुष्ट हो सकें और स्थापना को समान महत्व दे सकें। सर्वप्रथम इसके विज्ञान पक्ष को लेंगे। ललाट में टिका या तिलक जिस स्थान पर लगाया जाता है, वह भ्रू-मध्य या आज्ञाचक्र है। शरीरशास्त्र की दृष्टि से यह स्थान पीनियल ग्रंथि का है। प्रयोगो द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि प्रकाश से गहरा संबंध हे।
प्रयोगो में जब किसी व्यक्ति की आँखो में पट्टी बाँधकर सिर को पूरी तरह से ढक दिया गया और उसकी पीनियल ग्रंथि को उद्ददीप्त किया गया , तो उसे मस्तक के अंदर प्रकाश की अनुभुति हुई। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि ध्यान- धारणा के माध्यम से साधक में जो प्रकाश का अवतरण आज्ञाचक्र में होता है, उसका कोई न कोई संबंध इस स्थूल अवयव से अवश्य है। ऋषियों को यह तथ्य भलीभाति पता था, इसलिए उन्होनें टीका लगाने के प्रचलन को पूजा उपासना के साथ-साथ हर शुभ कार्य से जोड़कर उसे धार्मिक कर्मकाड़ का एक अविच्छिन अंग बना दिया। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है की दोंनो भौंहों के बीच कुछ अतिरिक्त संवेदनशीलता होती है। इसे परीक्षा करके जाना जा सकता है।
यदि हम आँखे बंद करके बैठ जाएँ और कोई व्यक्ति हमारे भ्रू-मध्य के एकदम निकट ललाट की ओर तर्जनी उँगली ले जाए । तो वहाँ हमें कुछ विचित्र अनुभव होगा । यही तृतीय नेत्र की प्रतीति है। इस संवेदना को हम अपनी ऊँगली भृकुटि-मध्य लाकर भी अनुभव कर सकता है। इसलिए इस केन्द्र पर जब तिलक अथवा टीका लगाया जाता है, तो उससे आज्ञाचक्र को नियमित रुप से उत्तेजना मिलती रहती है। इससे सजग रुप में हम भले ही उससे जागरण के प्रति अनभिज्ञ रहें, पर अनावरण का वह क्रम हनवरत चलता रहता है। तिलक का तत्वदर्शन अपने आप में अनेंको प्रेरणाएँ सँजोएं हुए है।
तिलक या त्रिपुंड प्रायः चंदन का होता है। चंदन की प्रकृति शीतल होती है। शीतल चंदन जब मस्तक पर लगाया जाता है, तो उसके पीछे भाव यह होता है कि चिंतन का जो केंद्रिय संस्थान मस्तिष्क के रुप में खोपड़ी के अंदर विराजमान है, वह हमेशा शीतल बना रहे, उसके विचार और भाव इतने श्रेष्ठ हों जि अपनी तरह औंरो को भी शीतलता, शांति और प्रसन्नता प्रदान करता रहे। तिलक का महत्व जनजीवन में इतना अधिक है कि जब कोई महत्वपूर्ण, सम्मानसूचक, प्रसन्नदायक घतना घटती है, तो माथे पर तिलक लगा दिया जाता है। विवाह हो रहा हो तो तिलक, कोई युद्ध पर जा रहा हो तो तिलक हो। कोई युद्ध से विजयी होकर लौट रहा हो तो तिलक हो अर्थात् कोई भी सुखमय घटना हो, उसके साथ तिलक का अविच्छिन संबंध जोड़ दिया जाता है। ऐसा इसलिए कि वह आमनद चिरस्मरणीय बना रहे। विवाहित स्त्रियाँ माँग में सिंदूर और माथे पर बिंदी लगाती है।
बिंदी टीके का रुप है, वैसे ही माँग का सिंदूर तिलक का प्रतिक है। किंतु यहाँ इन्हे परिणीता के सुहाग के साथ जोड़ा दिया गया है। यह अक्षत सुहाग के चिन्ह हैं। इनमें समर्पण और निष्ठा का भाव पूर्णरुपेण पति की ओर है। वह उसकी समर्पिता है। अब उसके नारित्व पर कोई बाधा नहीं पड़ेगी, इसलिए पत्नी को पति के जीवन रहने तक इन्हे धारण करना पड़ता है। तिलक द्रव्य के रुप में भीन्न-भीन्न प्रकार की वस्तो्ओं का प्रयोग किया जाता है। श्वेत और रक्त चंदन भक्ति के प्रतिक हैं। इनका इस्तेमाल भजनानंदी किस्म के लोग करते है। केशर एवं गोरोचन ज्ञान तथा वैराज्ञ्य के प्रतिक है। ज्ञानी तत्वचिंतक और विरक्त ह्रदय वाले लोग इसका प्रयोग करते है। कस्तूरी ज्ञान, वैराज्ञ्य, भक्ति, प्रेम, सौंदर्य, ऐश्वर्य सभी का प्रतीक है, ।
मार्कण्डेय पुराण के ‘स्त्रिय समस्ता सकला जगत्सु’ के अनुसार नारी समाज शक्ति रूपा है। नारी समाज के सौभाग्य में लाल वर्ण की प्रधानता का यही कारण और मस्तक पर लाल वर्ण के रूप में हम मातृशक्ति धारण करने की कामना करते हैं।
यही कारण है कि ज्यादातर सांस्कृतिक तिलक महिलाएं ही पुरूषों के भाल पर करती है। चाहे वह बहिन, पत्नी या माँ किसी भी रूप में हो।
मानस की पंक्तियाँ : चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़ , तुलसीदास चंदन घिसें ,तिलक देत रघुबीर . तिलक परम्परा का अनुमोदन करतीं हैं .आज भी फौजी जब शत्रु से मोर्चे के लिए घर से विदा लेता है, तो माँ बहिन पत्नी उसको तिलक लगातीं हैं ,यात्रा पर जाने से पूर्व तिलक लगाने को शुभ माना जाता है ।
इस प्रकार तिलक या टीका एक धार्मिक प्रतीत होते हुए भी उसमें विज्ञान और दर्शन का साथ-साथ समावेश है। इनको समझ सकें और उनकी शिक्षाओं को आत्त्मसात् कर सकें तो ही उसकी सार्थकता है।
हिंदुओं को तिलक क्यों धारण करना चाहिए ?शायद भारत के सिवा और कहीं भी मस्तक पर तिलक लगाने की प्रथा प्रचलित नहीं है। यह रिवाज अत्यंत प्राचीन है। माना जाता है कि मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान का निवास होता है, और तिलक ठीक इसी स्थान पर लगाया जाता है। मनोविज्ञान की दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है। माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है, जहां सबकी नजर अटकती है। उसके मध्य में तिलक लगाकर, विशेषकर स्त्रियों में, देखने वाले की दृष्टि को बांधे रखने का प्रय त्न किया जाता है।
स्त्रियां लाल कुंकुम का तिलक लगाती हैं। यह भी बिना प्रयोजन नहीं है। लाल रंग ऊर्जा एवं स्फूर्ति का प्रतीक होता है। तिलक स्त्रियों के सौंदर्य में अभिवृद्धि करता है। तिलक लगाना देवी की आराधना से भी जुड़ा है। देवी की पूजा करने के बाद माथे पर तिलक लगाया जाता है। तिलक देवी के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
तिलक का महत्व हिन्दु परम्परा में मस्तक पर तिलक लगाना शूभ माना जाता है इसे सात्विकता का प्रतीक माना जाता है विजयश्री प्राप्त करने के उद्देश्य रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुम्कुम का तिलक या कार्य की महत्ता को ध्यान में रखकर, इसी प्रकार शुभकामनाओं के रुप में हमारे तीर्थस्थानों पर, विभिन्न पर्वो-त्यौहारों, विशेष अतिथि आगमन पर आवाजाही के उद्देश्य से भी लगाया जाता है ।
मस्तिष्क के भ्रु-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है । शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता हैं, तो मस्तष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है । इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा । इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शूभकार्यो में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें । इस आसान तरीके से सर्वसाधारण की रुचि धार्मिकता की ओर, आत्मिकता की ओर, तृतीय नेत्र जानकर इसके उन्मीलन की दिशा में किया गयचा प्रयास जिससे आज्ञाचक्र को नियमित उत्तेजना मिलती रहती है ।
तन्त्र शास्त्र के अनुसार माथे को इष्ट इष्ट देव का प्रतीक समझा जाता है हमारे इष्ट देव की स्मृति हमें सदैव बनी रहे इस तरह की धारणा क ध्यान में रखकर, ताकि मन में उस केन्द्रबिन्दु की स्मृति हो सकें । शरीर व्यापी चेतना शनैः शनैः आज्ञाचक्र पर एकत्रित होती रहे । चुँकि चेतना सारे शरीर में फैली रहती है । अतः इसे तिलक या टीके के माधअयम से आज्ञाचक्र पर एकत्रित कर, तीसरे नेत्र को जागृत करा सकें ताकि हम परामानसिक जगत में प्रवेश कर सकें ।
तिलक का हमारे जीवन में कितना महत्व है शुभघटना से लेकर अन्य कई धार्मिक अनुष्ठानों, संस्कारों, युद्ध लडने जाने वाले को शुभकामनाँ के तौर पर तिलक लगाया जाता है वे प्रसंग जिन्हें हम हमारी स्मृति-पटल से हटाना नही चाहते इन शुशियों को मस्तिष्क में स्थआई तौर पर रखने, शुभ-प्रसंगों इत्यादि के लिए तिलक लगाया जाता है हमारे जीवन में तिलक का बडा महत्व है तत्वदर्शन व विज्ञान भी इसके प्रचलन को शिक्षा को बढाने व हमारे हमारे जीवन सरल व सार्थकता उतारने के जरुरत है ?।
तिलक हिंदू संस्कृति में एक पहचान चिन्ह का काम करता है। तिलक केवल धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि कई वैज्ञानिक कारण भी हैं इसके पीछे। तिलक केवल एक तरह से नहीं लगाया जाता। हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ है, संप्रदाय हैं उन सबके अपने अलग-अलग तिलक होते हैं।
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मूर्ति पूजा:- भारतीय संस्कृति में प्रतीकवाद का महत्वपूर्ण स्थान है । सबके लिए सरल सीधी पूजा-पद्धति को आविष्कार करने का श्रेय भारत को ही प्राप्त है । पूजा-पद्धति की उपयोगिता और सरलता की दृष्टि से हिन्दू धर्म की तुलना अन्य सम्प्रदायों से नहीं हो सकती । हिन्दू धर्म में ऐसे वैज्ञानिक मूलभूत सिद्धांत दिखाई पउ़ते हैं, जिनसे हिन्दुओं का कुशाग्र बुद्धि विवेक और मनोविज्ञान की अपूर्व जानकारी का पता चलता है । मूर्ति-पूजा ऐसी ही प्रतीक पद्धति है । मूर्ति-पूजा क्या है? पत्थर, मिट्टी, धातु या चित्र इत्यादि की प्रतिमा को माध्यस्थ बनाकर हम सर्वव्यापी अनन्त शक्तियों और गुणों से सम्पन्न परमात्मा को अपने सम्मुख उपस्थित देखते हैं । निराकार ब्रह्म का मानस चित्र निर्माण करना कष्टसाध्य है । बड़े योगी, विचारक, तत्ववेत्ता सम्भव है यह कठिन कार्य कर दिखायें,किन्तु साधारण जन के जिए तो वह नितांत असम्भव सा है । भावुक भक्तों, विशेषतः नारी उपासको ं के लिए किसी प्रकार की मूर्ति का आधार रहने से उपासना में बड़ी सहायता मिलती है । मानस चिन्तन और एकताग्रता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रतीक रूप में मूर्ति-पूजा की योजना बनी है । साधक अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान की कोई भी मूर्ति चुन लेता है और साधना अन्तःचेतना ऐसा अनुभव करती है मानो साक्षात् भगवान से हमारा मिलन हो रहा है ।
मनीषियों का यह कथन सत्य हे कि इस प्रकार की मूर्ति-पूजा में भावना प्रधान और प्रतिमा गौण है, तो भी प्रतिमा को ही यह श्रेय देना पड़ेगा कि वह भगवान की भावनाओं का उदे्रक और संचार विशेष रूप से हमारे अन्तःकरण में करती है । यों कोई चाहे, तो चाहे जब जहाँ भगवान को स्मरण कर सकता है, पर मन्दिर में जाकर प्रभु-प्रतिमा के सम्मुख अनायास ही जो आनंद प्राप्त होता है, वह बिना मन्दिर में जाये, चाहे, जब कठिनता से ही प्राप्त होगा । गंगा-तट पर बैठकर ईश्वरीय शक्तियों का जो चमत्कार मन में उत्पन्न होता है, वह अन्यत्र मुश्किल से ही हो सकता है ।
मूर्ति-पूजा के साथ-साथ धर्म मार्ग में सिद्धांतमय प्रगति करने के लिए हमारे यहाँ त्याग और संयम पर बड़ा जोर दिया गया है । सोलह संस्कार, नाना प्रकार के धार्मिक कर्मकाण्ड, व्रत, जप, तप, पूजा, अनुष्ठान,तीर्थ यात्राएँ, दान, पुण्य, स्वाध्याय, सत्संग ऐसे ही दिव्य प्रयोजन हैं, जिनसे मनुष्य में संयम ऐसे ही दिव्य प्रयोजन हैं, जिनसे मनुष्य में संयम और व्यवस्था आती है । मन दृढ़ बनकर दिव्यत्व की ओर बढ़ता है । आध्यात्मिक नियंत्रण में रहने का अभ्यस्त बनता है ।
मूर्ति-पूजा के पक्ष में प. दीनानाथ शर्मा के विचार बहुमूल्य हैं । शर्मा जी लिखते हैः-
”जड़ (मूल)ही सबका आधार हुआ करती है । जड़ सेवा के बिना किसी का भी कार्य नहीं चलता । दूसरे की आत्मा की प्रसन्नतार्थ उसके आधारभूत जड़ शरीर एवं उसके अंगों की सेवा करनी पड़ती है । परमात्मा की उपासना के लिए भी उसके आश्र्ाय स्वरूप जड़ प्रकृति की पूजा करनी पड़ती है । हम वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, प्रकाश आदि की उपासना में प्रचुर लाभ उठाते हैं, तब मूर्ति-पूजा से क्यों घबराना चाहिए? उसके द्वारा तो आप अणु-अणु में व्यापक चेतन (सच्चिदानंद) की पूजा कर रहे होते हैं । आप जिस बुद्धि को या मन को आधारीभूत करके परमात्मा का अध्ययन कर रहे होते हैं क्यों वे जड़ नहीं हैं? परमात्मा भी जड़ प्रकृति के बिना कुछ नहीं कर सकता, सृष्टि भी नहीं रच सकता । तब सिद्ध हुआ कि जड़ और चेतन का परस्पर संबंध है । तब परमात्मा भी किसी मूर्ति के बिना उपास्य कैसे हो सकता है? “
” हमारे यहाँ मूर्तियाँ मन्दिरों में स्थापित हैं, जिनमें भावुक जिज्ञासु पूजन, वन्दन अर्चन के लिए जाते हैं और ईश्वर की मूर्तियों पर चित्त एकाग्र करते हैं । घर में परिवार की नाना चिन्ताओं से भरे रहने के कारण पूजा, अर्चन, ध्यान इत्यादि इतनी तरह नहीं हो पाता, जितना मन्दिर के प्रशान्त स्वच्छ वातावरण में हो सकता है । अच्छे वातावरण का प्रभाव हमारी उत्तम वृत्तियों को शक्तिवान् बनाने वाला है । मन्दिर के सात्विक वातावरण में कुप्रवृत्तियाँ स्वयं फीकी पड़ जाती हैं । इसलिए हिन्दू संस्कृति में मन्दिर की स्थापना को बड़ा महत्व दिया गया है ।”
कुछ व्यक्ति कहते हैं कि मन्दिरों में अनाचार होते हैं । उनकी संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती रही है । उन पर बहुत व्यय हो रहा है । अतः उन्हें समाप्त कर देना चाहिए । सम्भव है इनमें से कुछ आक्षेप सत्य हों, किन्तु मन्दिरों को समाप्त कर देने या सरकार द्वारा जब्त कर लेने मात्र से क्या अनाचार दूर हो जायेंगे? यदि किसी अंग में कोई विकार आ जाय, तो क्या उसे जड़मूल से नष्ट कर देना उचित है? कदापि नहीं । उसमें उचित परिष्कार और सुधार करना चाहिए । इसी बात की आवश्यकता आज हमारे मन्दिरों में है । मन्दिर स्वेच्छ नैतिक शिक्षण के केन्द्र रहें । उनमें पढ़े- लिखे निस्पृह पुजारी रखे जायं, जो मूर्ति-पूजा कराने के साथ-साथ जनता को धर्म-ग्रन्थों, आचार शास्त्रों, नीति,ज्ञान का शिक्षण भी दें और जिनका चरित्र जनता के लिए आदर्श रूप हो ।
- पं श्री राम शर्मा “आचार्य”
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Telepathy: It is thought transmission between two or more people. The human brain is able to send and receive messages in the form of thoughts. Keep in mind that the telepathic language is conceptual, so every conscious state the content according to their peculiarities, however the background does not change, only how to express it. could say that the brain is like a radio station that can transmit and receive at three different frequencies: the conscious would work on medium wave, short wave the unconscious and the subconscious in FM. All humans are emitting brainwaves constantly. These waves have a length and a frequency specific, so do not interfere, it's like they have their own
channel, as with radio waves. The wavelength depends only on the conformation of the body or mental interconnection. //\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\
ऋषियों द्वारा भगवान् वाराह की स्तुति :-Sages sing in praise of Lord Varah :-हे परम पुरुष! आपकी त्वचा में छन्द स्थित हैं। रोमों में कुशा समूह हैं, और नेत्रों में घी है। चारों होता आपके चरणों में हैं। मुख में स्रुक और उदर में इडा (पुरोडाश रखने का पात्र) का स्थान है। आपकी जिह्वा में ग्रह (सोमरस रखने का पात्र) और कानों में चमस (भोजन सामग्री के पात्र) स्थित हैं। हे विभो! सोमरस आपका वीर्य है। हे वरद! उपसद (इष्टियां) आपके कण्ठ में स्थित हैं। हे स्वानन्द विहारी! इस प्रकार मुनियों के द्वारा गाई गई मन को प्रसन्न करने वाली अनेक स्तुतियों के उच्चारण से प्रसन्न चित्त आप अपने निवास स्थान वैकुण्ठ को चले गये। हे मधुरिपु! हे वातालयपति! मेरे भी समस्त रोगों का विनाश कीजिये। O Infinite Lord! In Thy skin are the Vedic Mantras, Thy hair are the 'kush' grass, Thy eyes are the ghee, Thy feet are the four sacrificing priests, Thy face is 'sruk',( the ladel for sacrifice) and Thy stomach is the 'Ida' (the vessel which holds the sacrificial ingredients), Thy tongue is the soma pot. O Lord! Thy ears are the chamasas (the vessel which holds the sacrificial remnants) and Thy virility is soma. O Bestower of Boons! in Thy neck are the sacrifices called Upasat, (the subsidiary rites). Thou are the embodiment of the holy Yagna. O Lord of Guruvaayur! O Destroyer of Madhu! Delighted with the hymns of the sages Thou shone with Thy huge and adorable form and taintless glory and retired to Thy abode of Vaikunth, revelling in Thy innate Bliss. May Thou be pleased to eradicate all my ailments. Narayaneeyam is a short Bhaagwatam of 1000 shlokas by Pandit Melputur Narayan Bhattadri ji of Keral, based on Shrimad Bhaagwatam by Ved Vyaas Maharaj{having 18000 shlokas} प्रस्तुत श्लोक नारायनीयम में से लिए गये हैं , नारायनीयम संक्षिप्त भागवत है , जिसमे केवल १००० श्लोक हैं , नारायनीयम केरल के पंडित मेल्पुतूर नारायण भटादरी जी द्वारा लिखी हुयी है वेद व्यास जी द्वारा रचित श्रीमद भागवत महापुराण{ जिसमे १८००० श्लोक हैं } पर आधारित कृति है ॐ ॐ
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महाराज युधिष्ठिर से मोहम्मद गोरी तक के वंश का वर्णनमहाभारत युद्ध के पश्चात् राजा युधिष्ठिर की ३० पीढ़ियों ने १७७० वर्ष ११ माह १० दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा हैःयुधिष्ठिर : ३६ वर्षपरीक्षित: ६० वर्षजनमेजय: ८४ वर्षअश्वमेध: ८२ वर्षद्वैतीयरम: ८८ वर्ष क्षत्रमाल: ८१ वर्ष चित्ररथ: ७५ वर्ष दुष्टशैल्य: ७५ वर्ष उग्रसेन: ७८ वर्ष शूरसेन: ७८ वर्ष भुवनपति: ६९ वर्ष रणजीत: ६५ वर्ष श्रक्षक: ६४ वर्ष सुखदेव: ६२ वर्ष नरहरिदेव: ५१ वर्ष शुचिरथ: ४२ वर्ष शूरसेन द्वितीय: ५८ वर्ष पर्वतसेन: ५५ वर्ष मेधावी: ५२ वर्ष सोनचीर: ५० वर्ष भीमदेव: ४७ वर्ष नरहिरदेव द्वितीय: ४७ वर्ष पूरनमाल: ४४ वर्ष कर्दवी: ४४ वर्ष अलामामिक: ५० वर्ष उदयपाल: ३८ वर्ष दुवानमल: ४० वर्ष दामात: ३२ वर्ष भीमपाल: ५८ वर्ष क्षेमक: ४८ वर्ष
क्षेमक के प्रधानमन्त्री विश्व ने क्षेमक का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी १४ पीढ़ियों ने ५०० वर्ष ३ माह १७ दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है।
विश्व: १७ वर्ष पुरसेनी: ४२ वर्ष वीरसेनी: ५२ वर्ष अंगशायी: ४७ वर्ष हरिजित: ३५ वर्ष परमसेनी: ४४ वर्ष सुखपाताल: ३० वर्ष काद्रुत: ४२ वर्ष सज्ज: ३२ वर्ष आम्रचूड़: २७ वर्ष अमिपाल: २२ वर्ष दशरथ: २५ वर्ष वीरसाल: ३१ वर्ष वीरसालसेन: ४७ वर्ष
वीरसालसेन के प्रधानमन्त्री वीरमाह ने वीरसालसेन का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी १६ पीढ़ियों ने ४४५ वर्ष ५ माह ३ दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है।
वीरमाह: ३५ वर्ष अजितसिंह: २७ वर्ष सर्वदत्त: २८ वर्ष भुवनपति: १५ वर्ष वीरसेन: २१ वर्ष महिपाल: ४० वर्ष शत्रुशाल: २६ वर्ष संघराज: १७ वर्ष तेजपाल: २८ वर्ष मानिकचंद: ३७ वर्ष कामसेनी: ४२ वर्ष शत्रुमर्दन: ८ वर्ष जीवनलोक: २८ वर्ष हरिराव: २६ वर्ष वीरसेन द्वितीय: ३५ वर्ष आदित्यकेतु: २३ वर्ष
प्रयाग के राजा धनधर ने आदित्यकेतु का वध करके उसके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी ९ पीढ़ी ने ३७४ वर्ष ११ माह २६ दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है।
धनधर: २३ वर्ष महर्षि: ४१ वर्ष संरछि: ५० वर्ष महायुध: ३० वर्ष दुर्नाथ: २८ वर्ष जीवनराज: ४५ रुद्रसेन: ४७ वर्ष आरिलक: ५२ वर्ष राजपाल: ३६ वर्ष सामन्त महानपाल ने राजपाल का वध करके १४ वर्ष तक राज्य किया।
अवन्तिका (वर्तमान उज्जैन) के विक्रमादित्य ने महानपाल का वध करके ९३ वर्ष तक राज्य किया।
विक्रमादित्य का वध समुद्रपाल ने किया और उसकी १६ पीढ़ियों ने ३७२ वर्ष ४ माह २७ दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।
समुद्रपाल: ५४ वर्ष चन्द्रपाल: ३६ वर्ष सहपाल: ११ वर्ष देवपाल: २७ वर्ष नरसिंहपाल: १८ वर्ष सामपाल: २७ वर्ष रघुपाल: २२ वर्ष गोविन्दपाल: २७ वर्ष अमृतपाल: ३६ वर्ष बालिपाल: १२ वर्ष महिपाल: १३ वर्ष हरिपाल: १४ वर्ष सीसपाल: ११ वर्ष (कुछ ग्रंथों में सीसपाल के स्थान पर भीमपाल का उल्लेख मिलता है, सम्भव है कि उसके दो नाम रहे हों।). मदनपाल: १७ वर्ष कर्मपाल: १६ वर्ष विक्रमपाल: २४ वर्ष विक्रमपाल ने पश्चिम में स्थित राजा मालकचन्द बोहरा के राज्य पर आक्रमण कर दिया जिसमे मालकचन्द बोहरा की विजय हुई और विक्रमपाल मारा गया। मालकचन्द बोहरा की १० पीढ़ियों ने १९१ वर्ष १ माह १६ दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है। मालकचन्द: ५४ वर्ष विक्रमचन्द: १२ वर्ष मानकचन्द: १० वर्ष रामचन्द: १३ वर्ष हरिचंद: १४ वर्ष कल्याणचन्द: १० वर्ष भीमचन्द: १६ वर्ष लोवचन्द: २६ वर्ष गोविन्दचन्द: ३१ वर्ष रानी पद्मावती: १ वर्ष रानी पद्मावती गोविन्दचन्द की पत्नी थीं। कोई सन्तान न होने के कारण पद्मावती ने हरिप्रेम वैरागी को सिंहासनारूढ़ किया जिसकी ४ पीढ़ियों ने 50 वर्ष 0 माह 12 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।
हरिप्रेम: ७ वर्ष गोविन्दप्रेम: २० वर्ष गोपालप्रेम: १५ वर्ष महाबाहु: ६ वर्ष महाबाहु ने सन्यास ले लिया। इस पर बंगाल के अधिसेन ने उसके राज्य पर आक्रमण कर अधिकार जमा लिया। अधिसेन की १२ पीढ़ियों ने १५२ वर्ष ११ माह २ दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है। अधिसेन: १८ वर्ष विल्वसेन: १२ वर्ष केशवसेन: १५ वर्ष माधवसेन: १२ वर्ष मयूरसेन: २० वर्ष भीमसेन: ५ वर्ष कल्याणसेन: ४ वर्ष हरिसेन: १२ वर्ष क्षेमसेन: ८ वर्ष नारायणसेन: २ वर्ष लक्ष्मीसेन: २६ वर्ष दामोदरसेन: ११ वर्ष दामोदरसेन ने उमराव दीपसिंह को प्रताड़ित किया तो दीपसिंह ने सेना की सहायता से दामोदरसेन का वध करके राज्य पर अधिकार कर लिया तथा उसकी ६ पीढ़ियों ने १०७ वर्ष ६ माह २२ दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है। दीपसिंह: १७ वर्ष राजसिंह: १४ वर्ष रणसिंह: ९ वर्ष नरसिंह: ४५ वर्ष हरिसिंह: १३ वर्ष जीवनसिंह: ८ वर्ष पृथ्वीराज चौहान ने जीवनसिंह पर आक्रमण करके तथा उसका वध करके राज्य पर अधिकार प्राप्त कर लिया। पृथ्वीराज चौहान की ५ पीढ़ियों ने ८६ वर्ष २० दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है। पृथ्वीराज: १२ वर्ष अभयपाल: १४ वर्ष दुर्जनपाल: ११ वर्ष उदयपाल: ११ वर्ष यशपाल: ३६ वर्ष
विक्रम संवत १२४९ (1193 AD) में मोहम्मद गोरी ने यशपाल पर आक्रमण कर उसे प्रयाग के कारागार में डाल दिया और उसके राज्य को अधिकार में ले लिया। //\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\ //\\//\\//\\
त्रिगुण परीक्षणजिंदगी में अधिकतर व्यक्ति व्यर्थ की बातें सुनकर नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं और अकारण ही चिंता, तनाव उनके शरीर में घर कर जाते हैं, जो असमय ही व्यक्ति को न सिर्फ बीमार व बूढ़ा बना देते हैं, बल्कि कई बार तो उसे मृत्यु की गोद में सुला देते हैं। अक्सर हमें हर कहीं यह सुनने को मिल जाता है कि जीवन में नकारात्मक विचारों को अपने अंदर प्रवेश नहीं करने देना चाहिए, हमेशा सद्गुणों को उभारने का प्रयास करना चाहिए, परोपकार करने को तैयार रहना चाहिए। नकारात्मक विचार व्यक्ति के अंदर न पनपें इसके लिए क्या करें? इसी तरह सद्गुणों को उभारने के लिए क्या करें?
जीवन में सहज-सरल व सुलभ वस्तु सबको आकर्षित करती है। सच पर डटे रहना कठिन लगता है, झूठ व बेईमानी सरल प्रतीत होता है। किंतु क्या सच पर डटे रहना वाकई कठिन है और झूठ व बेईमानी को ओढ़ना बहुत सरल। अगर शांत चित्त से प्रत्येक व्यक्ति स्वयं ही इस बात का आंकलन करे तो वह जान जाएगा कि सच बोलना न ही कठिन है और न ही मुश्किल। वहीं बेईमानी व झूठ का चोला ओढ़ना आसान नहीं अपितु बहुत मुश्किल है। लेकिन इसका उल्टा हमें इसलिए प्रतीत होता है, क्योंकि कई बार सत्य व सद्गुणों का परिणाम हमें थोड़ा देर से मिलता है। जीवन को सद्गुणों व नेक कर्मों से परिपूर्ण बनाया जा सकता है। बस इसके लिए समय-समय पर जीवन में त्रिगुणों का परीक्षण करने की जरूरत है। यह त्रिगुण हैं- सत्य, अच्छाई और उपयोगिता।
त्रिगुणों का पहला गुण सत्य है। यदि यही बात सत्य होगी तो निश्चित रूप से अच्छाई लिए भी होगी। क्योंकि सत्य चाहे कड़वा हो लेकिन अच्छाई लिए हुए ही होता है। यह बात दूसरी है कि लोग उस समय सत्य व अच्छाई की शक्ति से परिचित नहीं हो पाते। लेकिन यदि एक बार जीवन में इन त्रिगुणों का परीक्षण गंभीरता से किया जाए तो व्यक्ति का जीवन सफल व सुखी बन जाएगा। त्रिगुण परीक्षणों को एक दार्शनिक ने अपने जीवन का महत्वपूर्ण अंग माना था। उन्होंने जीवन में त्रिगुण परीक्षण के माध्यम से जीवन को सुखी बनाने का दृढ़ आधार प्रदान किया था।
एक दिन दार्शनिक का एक परीचित उनके पास आकर उत्साह से कहता है, 'आप जानते हैं, अभी-अभी मैंने आपके मित्र के बारे में क्या सुना?' दार्शनिक अपनी तर्क शक्ति, ज्ञान और व्यवहार-कुशलता के लिए विख्यात थे। उन्होंने अपने परिचित से कहा, 'आपकी बात मैं सुनूं, इससे पहले मैं चाहूंगा कि आप त्रिगुण परीक्षण से गुजरें।' 'त्रिगुण परीक्षण, यह क्या है?' परिचित अचरज से बोला। परिचित का बोलने का अंदाज सुनकर दार्शनिक मुस्कराए और बोले, 'आप जो कुछ कहने वाले हैं, उसे थोड़ा परख लें, थोड़ा छान लें। इसलिए परख और थोड़ा छानने को मैं त्रिगुण परीक्षण कहता हूं। इसकी पहली कसौटी है सत्य। इस कसौटी के अनुसार यह जानना जरूरी है कि जो आप मुझे कहने वाले हैं, क्या वह सत्य है? जो आप मुझसे कहने जा रहे हैं, क्या आप खुद उसके बारे में अच्छी तरह से जानते हैं?' दार्षनिक की बात सुनकर परिचित कुछ सोचते हुए बोला, 'आप सही कह रहे हैं। जो कुछ मैं आपके मित्र के बारे में बताने वाला हूं उससे मैं स्वयं परिचित नहीं हूं, अपितु मैंने वह बात कहीं से सुनी है। मैंने खुद इस बात को परखा नहीं है कि वह बात सही है या गलत।'
परिचित की बात सुनकर दार्शनिक बोले, 'ठीक है। आपको यह ज्ञात नहीं है कि जो बात आप मुझे बताने जा रहे हैं वह सत्य है अथवा असत्य।' इसका अर्थ हुआ कि जिस बात के बारे में यह ही मालूम नहीं है कि वह सही भी है या नहीं। तो उसके बारे में सही तथ्य जाने बिना चिंता या परेशानी करने का कोई लाभ नहीं है। दूसरी कसौटी है अच्छाई। क्या आप मुझे मेरे मित्र की कोई अच्छाई बताने वाले हैं? या ऐसा कुछ बताने वाले हैं जिससे मेरे मित्र का हित होगा।' यह सुनकर परिचित बोला, 'नहीं।' इस पर दार्शनिक बोले, 'जो आप मुझे बताने जा रहे हैं वह न ही सत्य है, न ही अच्छा। अब तीसरी परीक्षण भी कर लेते हैं और वह है उपयोगिता। जो आप मुझे कहने वाले हैं क्या वह मेरे लिए या मित्र के लिए उपयोगी है?' यह सुनकर मित्र बोला, 'नहीं ऐसा तो नहीं है।' यह सुनकर दार्शनिक बोले, 'जो बात आप मुझे बताना चाह रहे हैं, वह न सत्य है, न अच्छी और न ही मेरे लिए उपयोगी। फिर मैं उसे क्यों सुनूं?' व्यर्थ की बातें सुनकर मेरे मस्तिष्क में अच्छे-बुरे ख्याल बनने लगेगें जो मुझे मेरे पथ से भ्रमित कर देंगे।' दार्शनिक की बातें सुनकर परिचित समझ गया कि अपने जीवन में त्रिगुण परीक्षण अमल में लाने के कारण ही दार्शनिक दूरदर्शी, महान, बुद्धिजीवी व कौशल से भरपूर हैं।
त्रिगुण परीक्षण हर साधारण व्यक्ति कर सकता है। यदि वह सत्य, अच्छाई और उपयोगिता को ध्यान में रखकर काम करेगा तो निश्चित ही उसे सफलता के साथ-साथ मानसिक व आत्मिक संतुष्टि भी प्राप्त होगी जो उसके जीवन को एक नई दिशा देगी। मनुष्य के रूप में प्रसिद्ध महान विभूतियां अलग नहीं होतीं अपितु हम जैसे लोगों के बीच में से ही होती हैं। हां यह अवश्य है कि वह त्रिगुण परीक्षण से परिचित होती हैं, और समय-समय पर त्रिगुण परीक्षण करके अपने जीवन को महान बना लेती हैं।
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हमारी पूजा पद्यतिहिंदू धर्म में पूजा उपासना का एक महत्वपूर्ण अंग है। मूर्तियों का पूजन कर्मकांड की पद्धतियों से किया जाता है। कर्मकांड हमारे जीवन में अनुशासन लाते हैं। हर कार्य को पूरी नीति से करने की प्रेरणा देते हैं। ऋषिमुनियों द्वारा रचित यह पद्धति पूर्णत: वैज्ञानिक है एवं मनुष्यों को मानसिक और व्यक्तिगत ऊर्जा प्रदान करने वाली है। पूजन पद्धतियां तीन प्रकार की है:1. पंचोपचार 2. दशोपचार 3. षोडशोपचार1. पंचोपचार - पंचोपचार में पांच वस्तुओं से पूजन।2. दशोपचार - दशोपचार में दस वस्तुओं से पूजन।3. षोडषोपचार - षोडषोपचार में सोलह वस्तुओं से पूजन होता है। यह सबसे विस्तृत है। उपरोक्त दोनों पंचोपचार एवं दशोपचार षोडषोपचार में सम्मिलित है।यह सोलह वस्तुएं: दूध, दही, घी, शहद, शकर, वस्त्र, यज्ञोपवित, हल्दी, चंदन, कुमकुम, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवद्य, तांबुल।
1. कुश आसन हमारी धार्मिक मान्यताएं विज्ञान से प्रेरित हैं। कुश के आसन पर बैठना, सामने अपने ईष्ट देव की पीतल की या अष्टधातु की मूर्ति रखें। कुश का आसन क्यों ?कुश तालाब और नदियों पर उगने वाली एक घास है। वेद और पुराणों में कुश को पवित्र माना है। वैज्ञानिक कारण यह है कि कुश विद्युत का कुचालक होता है। पूजा, जाप से जो ऊर्जा उत्पन्न होती है। वह कुश का आसन होने से जमीन में नहीं जाती। शरीर में ही बनी रहती है। यही सिद्धिकारक होती है। देवी भागवत में कहा है। कुश धारण करने वालों के बाल नहीं झड़ते और हृदयाघात नहीं होता।
2. आचमन यानी मन, कर्म और वचन से शुद्धि आचमन का अर्थ है अंजलि मे जल लेकर पीना, यह शुद्धि के लिए किया जाता है। आचमन तीन बार किया जाता है। हाथ में जल लेकर अंगुठे के मूल भाग से जल पिया जाता है। तीन बार आचमन करने से कंठ का सूखापन दूर होता है। श्वसन क्रिया अच्छी होती है। मन और बोलने से जो पाप होते हैं, उनका निवारण होता है। इसके पीछे विज्ञान यह है कि मुख शुद्धि होती तथा जल अंदर जाने से आलस्य समाप्त होता है। इससे मन की शुद्धि होती है। तथा पूजन करने से शक्ति प्राप्त होती है।
3. संकल्प लक्ष्य प्राप्ति के लिए जरूरी हैसंकल्प का अर्थ है दृढ़ निश्चय, विचार, प्रतिज्ञा। किसी भी कार्य को करने के लिए संकल्प अति महत्वपूर्ण होता है। यहां हम पूजा-पद्धति में भी संकल्प का महत्व बता रहे हैं। जैसे किसी से मिलने के लिए, उसको मिलने का कारण, दिनांक, प्रयोजन सब बताने होते हैं। वैसे ही पूजन के पहले अपने देवता को आज की दिनांक समय अपना परिचय और पूजन का कारण बताना पड़ता है ताकि वह हमारे प्रयोजन को समझे और उसे पूर्ण करें।संकल्प करके या ठानकर कोई काम किया जाता है तो उसको पूर्ण करने की शक्ति प्राप्त होती है तथा कार्यपूर्णता को प्राप्त होता है। संकल्प करने से मनोबल में वृद्धि होती है तथा कार्य करने में एकाग्रता बलवती होती है।
4. न्यास : श्रेष्ठ गुणों को ग्रहण करने की क्रियान्यास द्वारा शरीर को पवित्र बनाना, आशय यह है कि देवता के तुल्य बनना। सभी अंगों को छूकर वहां पर देवता को मंत्रों के द्वारा स्थापित किया जाता है तथा शरीर को देवतुल्य बनाया जाता है।न्यास तीन प्रकार के होते हैं-1. अंग न्यास 2. कर न्यास 3. मातृका न्यास
१. अंग न्यास - इसके अंतर्गत सिर, नाक, हाथ, हृदय, उदर, जांघ, पैर आदि में सूर्य चंद्र का आह्वान किया जाता है।२. कर न्यास - हाथों से मनुष्य कर्म करता, कर न्यास में हाथों की अंगुलियों, अंगूठे और हथेली को पवित्र करते हैं। हमारे कर्म शुभ हो सबका भला करने वाले हो मुक्तिकारक हो यही मर्म है।३. मातृका न्यास - वाणी में सरस्वती वास करती है। चार प्रकार की वाणियां, परा, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी की वह स्वामिनी होती है। इस न्यास से साधक सरस्वती को शब्दों के रूप में शक्ति का अनुभव करता है।पूजन के पूर्व न्यास करने से शरीर तनावमुक्त बनता है। शरीर के हर अंग पर स्पर्श से, चिंता और थकावट से मुक्ति मिलती है।
5. दीपक, जीवन में ज्ञान के उजाले की तैयारीदीपक ज्ञान और रोशनी का प्रतीक है। पूजा में दीपक का विशेष महत्व है। आमतौर पर विषम संख्या वाले दीप प्रज्जवलित करने की परंपरा चली आ रही है। दीप प्रज्जवलन का भाव है। हम अज्ञान का अंधकार मिटाकर अपने जीवन में ज्ञान के प्रकाश के लिए पुरुषार्थ करें।प्राय: दीपक एक, तीन, पांच और सात की विषम संख्या में ही जलाए जाते हैं ऐसा मानना है। विषम संख्या में दीपों से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है।दीपक जलाने से वातावरण शुद्ध होता है। दीपक में गाय के दूध से बना घी प्रयोग हो तो अच्छा अथवा अन्य घी या तेल का प्रयोग भी किया जा सकता है। गाय के घी में रोगाणुओं को भगाने की क्षमता होती है। यह घी जब दीपक में अग्नि के संपर्क से वातावरण को पवित्र बना देता है। प्रदूषण दूर होता है। दीपक जलाने से पूरे घर को फायदा मिलता है। चाहे वह पूजा में सम्मिलित हो अथवा नहीं। दीप प्रज्जवलन घर को प्रदूषण मुक्त बनाने का एक क्रम है। दीपक में अग्नि का वास होता है। जो पृथ्वी पर सूरज का रूप है।
6. आह्वान - देवताओं को आमंत्रणआह्वान में अपने इष्टदेव को निमंत्रित किया जाता है कि वह हमारे सामने विराजमान हो।आह्वान का अर्थ है पास लाना। ईष्ट देवता को अपने सम्मुख या पास लाने के लिए आह्वान किया जाता है। उनसे निवेदन किया जाता है कि वे हमारे सामने हमारे पास आए, इसमें भाव यह होता है। कि वह हमारे ईष्ट देवता की मूर्ति में वास करें, तथा हमें आत्मिक बल एवं आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करें, ताकि हम उनका आदरपूर्वक सत्कार करें। जिस प्रकार मनोवांछित मेहमान या मित्र को अपने यहां आया देखकर आनंद प्रसन्नता होती है। वही आनंद उमंग अपने देवता के आह्वान से अर्थात् अपने पास बुलाने से होती है।आह्वान करने का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि भक्त या साधक अपने ईष्ट देवता के प्रति समर्पण भाव से विनम्रता व्यक्त करता है। आह्वान के पश्चात् भक्त के मन में यह भावना दृढ़ हो जाती है कि पूजा स्थल पर आमंत्रित दैवीय शक्ति का आगमन हो चुका है। इस प्रकार भक्त का मनोयोग पूजा कार्य में अधिक एकाग्रता पूर्वक संलग्न हो जाता है। पाद्यं, अध्र्य, स्नान यह तीनों सम्मान सूचक है। ऐसा भाव है कि भगवान के प्रकट होने पर उनके हाथ पावं धुलाकर आचमन कराकर स्नान कराते हैं तथा उन्हें आसन देकर आराम से बैठाते हैं।भाव यह है कि हमारे इष्टदेव आज हमारे सामने पधारे हैं। हम उनका पूरे भक्तिभाव से आदर सम्मान करें। चन्दनस्नान के बाद देवी देवता की प्रतिमा को चंदन समर्पित किया जाता है। पूजन करने वाला भी अपने मस्तक पर चंदन का तिलक लगाता है। यह सुगंधित होता है तथा इसका गुण शीतल है। भगवान को चंदन अर्पण करने का भाव यह है कि हमारा जीवन आपकी कृपा से सुगंध से भर जाए तथा हमारा व्यवहार शीतल होवे यानी ठंडे दिमाग से काम करना। अक्सर उत्तेजना में काम बिगड़ता है। चंदन लगाने से उत्तेजना काबू में आती है।चंदन का तिलक ललाट पर या छोटी सी ङ्क्षबदी के रूप में दोनों भौहों के मध्य लगाया जाता है। चंदन का तिलक लगाने से दिमाग में शांति, तरावट एवं शीतलता बनी रहती है। मस्तिष्क में सेराटोनिन व बीटाएंडोरफिन नामक रसायनों का संतुलन होता है। मेघाशक्ति बढ़ती है तथा मानसिक थकावट विकार नहीं होता।
पंचामृतपंचामृत का अर्थ है 'पांच अमृत' इनमें दूध, दही, घी, शक्कर, शहद को मिलाकर पंचामृत बनाया जाता है। इसी से भगवान का अभिषेक किया जाता है। दरअसल पंचामृत आत्मोन्नति के पांच प्रतीक है। यह पांचों सामग्री किसी न किसी रूप में आत्मोन्नति का संदेश देती है।-दूध- दूध पंचामृत का प्रथम भाग है। यह शुभ्रता का प्रतीक है। अर्थात् हमारा जीवन दूध की तरह निष्कलंक होना चाहिए।-दही- दही भी दूध की तरह सफेद होता है। लेकिन इसकी खूबी है यह दूसरों को अपने जैसा बनाता है। दही चढ़ाने का अर्थ यही है कि पहले हम निष्कलंक हो सद्गुण अपनाए और दूसरों को भी अपने जैसा बनाएं।-घी- घी स्निग्धता और स्नेह का प्रतिक है। स्नेह और प्रेम हमारे जीवन में स्नेह की तरह काम करता है। सभी से हमारे स्नेहयुक्त संबंध हो यही भावना है।-शहद- शहद मीठा होने के साथ ही शक्तिशाली भी होता है। निर्बल व्यक्ति जीवन में कुछ नहीं कर सकता, तन और मन से शक्तिशाली व्यक्ति ही सफलता पा सकता है। शहद इसका ही प्रतीक है।- शक्कर- शक्कर का गुण है मिठास, शक्कर चढ़ाने का अर्थ है जीवन में मिठास घोले। मिठास, प्रिय बोलने से आती है। प्रिय बोलना सभी को अच्छा लगता है। और इससे मधुर व्यवहार बनता है।हमारे जीवन में शुभ रहे, स्वयं अच्छे बनें, दूसरों को अच्छा बनाएं, शक्तिशाली बनें, दूसरों के जीवन में मधुरता लांए, मधुर व्यवहार बनाएं। इससे सफलता हमारे कदम चूमेगी। साथ ही हमारे अंदर महानता के गुण पैदा होंगे।वस्त्रपंचामृत स्नान के बाद भगवान का शुद्धिकरण स्नान किया जाता है तथा उनको वस्त्र अर्पण किए जाते हैं। वैसे तो भगवान भाव के भूखे हंै, लेकिन विधि विधान में वस्त्र चढ़ाने में हमारा भाव यह है कि यह वस्त्र भगवान को सर्दी-गर्मी से रक्षा करें। लज्जा से बचाएं और शरीर को सुंदरता प्रदान करें।वस्त्र हमारे जीवन में कितना महत्वपूर्ण है यह हम सभी जानते हैं, लेकिन पूजन में भाव यह होता है कि जो वस्त्र हमें पहनने के लिए मिलें वह भगवान की शक्ति से ही मिले । इसलिए भगवान को वस्त्र अर्पित करने से हमने कृतज्ञता की भावना बनी रहती है। यह भाव हमारे जीवन में अहंकार को दूर कर विनम्रता लाता है। विनम्र व्यक्ति हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है।आपके घर या कार्यालय में मंदिर हो तो आसन का वस्त्र साफ रखे, प्रतिमा का वस्त्र साफ स्वच्छ रखें। अपने पहनने के वस्त्र हमेशा साफ स्वच्छ रखें इससे आपका मन हमेशा प्रसन्न रहेगा और प्रसन्नता जीवन का मूल है।
यज्ञोपवीत - यज्ञोपवीत भगवान को समर्पित किया जाता है। यह देवी को अर्पण नहीं किया जाता है। यज्ञोपवीत दो शब्दों से मिलकर बना है। यज्ञ और उपवीत, यज्ञ अर्थात् शुभ कर्म और उपवीत का अर्थ सूत्र यज्ञोपवीत अर्थात् शुभ कर्मों के लिए धारण किया जाने वाला सूत्र इसे जनेऊ भी कहते हैं। यह सूत के धागे से बनता है।यज्ञोपवीत धारण करने से व्यक्ति की उम्र, ताकत, बुद्धि और विवेक बढ़ता है।यज्ञोपवीत पवित्रता का सूचक है। यज्ञोपवीत कान पर लपेटकर मलमूत्र त्यागने से कब्ज का नाश होता है। कान पर जनेऊ लपेटने से यह एक्युप्रेशर का काम करती है। कान के पास की नसे दबने से ब्लडप्रेशर नियंत्रित रहता है। यह हृदय रोगों से भी रक्षा करता है। वीर्य की रक्षा करता है। मूत्र त्याग के समय जनेऊ को कान पर लपेटने से, डायबीटिज, प्रमेह बहुमूत्र रोग नहीं होते। इसलिए यह भगवान के पूजन उपचार में प्रयोग होती है।
आभूषणषोडषोपचार में देवी-देवता पर आभूषण चढ़ाए जाते हैं। पूजा में स्वर्णआभूषण चढ़ाने का विशेष महत्व है। यह धन, संपदा तथा सौंदर्य के प्रतीक हंै।स्वर्ण आत्मा का प्रतीक है जिस तरह आत्मा अजर अमर शुद्ध है। उसी प्रकार स्वर्ण हर काल में शुद्ध है। भाव यह है कि हम आभूषण के रूप में अपनी आत्मा को देवता के चरणों में समर्पित कर रहे हैं। यह हमारे स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। स्वर्ण धातु, स्वर्णभस्म, शक्तिवर्धक टॉनिक एवं औषधियों मेें प्रयोग होती है। श्वंास, कफ, नपुसंकता, शीघ्र वीर्यपात, टीबी, आदि रोगों को दूर करने में यह प्रयोग होती है।ऐसी मान्यता है कि जिस घर में स्वर्ण होता है। वहां लक्ष्मी का वास होता है। धन, धान्य का अभाव नहीं रहता। स्वर्णाभूषण पहनने वाली महिला के पास दरिद्रता नहीं आती।जिस तरह स्वर्ण मूल्यवान है। हमारा शरीर भी मूल्यवान है। स्वर्ण की तरह मूल्यवान हमारा यह शरीर भगवान को समर्पित हो यही भावना रहती है। स्वर्ण को छूते ही शरीर में सुरक्षा तेज, स्वास्थ्य की वृद्धि होती है।
नानाद्रव्य (कुमकुम, गुलाल, अबीर, हल्दी, सिंदूर)आभूषण के पश्चात् देवी-देवता पर कंकु, गुलाल, अबीर, हल्दी, सिंदूर चढ़ाए जाते हैं।कंकुकंकु पूजा की अनिवार्य सामग्री है। यह लाल रंग का होता है। लाल रंग प्रेम, उत्साह, उमंग, साहस और शौर्य का प्रतीक है।कुमकुम सम्मान, विजय और आकर्षण का प्रतीक है। पुरुष अपने ललाट पर लंब एवं महिलाएं बिंदिया लगाती है। कुमकुम विजय का प्रतीक है। अत: हर कार्य को शुरू करने के पूर्व तिलक या बिंदिया लगायी जाती है।हल्दी, चूना, नींबू से मिलकर कुमकुम का निर्माण होता है। यह तीनों त्वचा का सौंदर्य बढ़ाने के काम आते हैं। कुमकुम से रक्त शोधन और मस्तिष्क के तंतु व्यवस्थित होते हैं।
गुलाल - पूजन में केवल लाल गुलाल का ही उपयोग होता है। चौक बनाने और अभिषेक में गुलाल का उपयोग होता है। भगवान को लाल गुलाल लगाकर हम अपने भाव और संवेदना को व्यक्त करते हैं। लाल गुलाल का इसलिए महत्व बढ़ जाता है कि यह पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता हे। इसमें तरंग शक्ति अधिक एवं यह रंग तेज वर्ण, ऊर्जा, साहस और बल का प्रतीक है।
अबीर - एक तरह से यह भगवान की श्रृंगार सामग्री है। अबीर में सुगंध होती है। जो चारों ओर के वातावरण को पवित्र बना देती है।अबीर मुख्यत: दो रंगों में मिलता है। हल्का पीला और सफेद रंग।अबीर देवता को अर्पण करना वस्तुत: विज्ञान और मनोविज्ञान का समन्वय है। यह सुगंध देता है। साधारण मनोविज्ञान है कि प्रात: अच्छी सुगंध से मन और वातावरण स्वच्छ एवं प्रसन्न होता है। आत्मबल का संचार होता है। सकारात्मक सोच आती है। विज्ञान यह है कि इसकी सुगंध से रोग फैलाने वाले कीटाणु नष्ट होते हैं।
हल्दी - इसके औषधि गुण के कारण इसका पूजा में प्रयोग किया जाता है।हल्दी का पीला रंग हमारे मस्तिष्क में नई शक्ति का संचार करता है। इसमें स्थित एंटिबायोटिक गुण हमारे छूने से हमारी त्वचा और सभी अंगों को लाभ पहुंचाते है।हल्दी का रंग पीला होता है। जो मंगल का सूचक है। घर से निकलते समय या सुबह उठकर प्रथम पीला रंग दिखने से शुभ मंगल होता है।
सिंदूर - सिंदूर का उपयोग भी भगवान के पूजन में होता है। सिंदूर पूजा में उपयोग के साथ ही श्री हनुमानजी, माताजी, भैरवजी पर इनका चौला भी चढ़ाया जाता है। सुख और सौभाग्य का दाता भी सिंदूर को माना जाता है।सिंदूर पूजन के साथ भारतीय हिंदू महिलाएं शादी के बाद मांग में भरती हैं। जो सौभाग्य का दाता है। सिंदूर का रंग आरोग्य, बुद्धि, त्याग और देवी महत्वकांक्षा का प्रतीक है। साधु-संत के वस्त्र का रंग भी ऐसा ही होता है।सिंदूर में पारा होता है। जो हमारे शरीर के लिए लाभकारी है। सिंदूर से मांग भरने से महिला के शरीर में स्थित वैद्युतिका उत्तेजना नियंत्रित होती है।
अक्षत - अक्षत का अर्थ है जो टूटा न हो। लोकाचार मे इसे चावल कहते हैं। पूजन की यह सबसे महत्वपूर्ण सामग्री है। पूजन में अक्षत तो अर्पण किया ही जाता है आमतौर पर तिलक करने में भी इसका उपयोग किया जाता है।अक्षत पूर्णता का प्रतीक है। इसका रंग सफेद होता है। जो शुभता का प्रतीक है। भगवान को अक्षत चढ़ाने का भाव यह है कि जिस तरह हमने पूर्ण चावल आपको चढ़ाया है हमें भी आप हमारे सत्कर्मों का पूर्ण फल प्रदान करें।अक्षत हमारे दैनिक उपयोग की वस्तु है, तथा यह हमें ईश्वर की कृपा से ही प्राप्त हुआ है, इसलिए भी उनको अर्पण किया जाता है।अक्षत (चावल) एक प्रोटीनदायक स्वादिष्ट एवं पौष्टिक आहार है जो इस्तेमाल करने वालों को बड़ा ही लाभकारी सिद्ध होता है। इसमें प्रोटीन के अलावा स्टार्च भी होता है। भारत के कई प्रदेशों में भोजन में मुख्यत: चावल ही प्रयोग किया जाता है।
दूर्वा - दूर्वा यानि दूब यह एक तरह की घास है जो पूजन में प्रयोग होती है। एक मात्र गणेश ही ऐसे देव है जिनको यह चढ़ाई जाती है। दूर्वा से गणेश जी प्रसन्न होते हैं।दूर्वा गणेशजी को अतिशय प्रिय है। इक्कीस दूर्वा को इक्क_ी कर एक गांठ बनाई जाती है तथा कुल 21 गांठ गणेशजी को चढ़ाई जाती है।कथा- गणेशजी को दूर्वा प्रिय क्यों है? इस बारे में एक कथा प्रचलित है। ऋषि-मुनि और देवता लोगों को एक साथ राक्षस परेशान किया करता था। जिसका नाम था अनलासुर (अनल का अर्थ है आग) देवताओं के अनुरोध पर गणेशजी ने उसे निगल लिया। इससे उनके पेट में तीव्र जलन हो गई तब कश्यप मुनि ने दूर्वा की 21 गांठ बनाकर उन्हें खिलाई जिससे यह जलन शांत हो गई।यह एक औषधि है। मानसिक शांति के लिए बहुत लाभप्रद है। यह विभिन्न बीमारियों में एंटिबायोटिक का काम करती है। उसको देखने और छूने से मानसिक शांति और जलन शांत होती है।वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया है कि केंसर रोगियों के लिए भी यह लाभप्रद है।
पुष्पमाला - इसके बाद में देवताओं को हार और पुष्प अर्पण किए जाते हैं। पुष्प सुंदरता और सुंगध के प्रतिक हैं। हमारा जीवन भी सुंदर और सुंगध से भरपूर हो। यही इसको चढ़ाने का भाव होता है। पुष्प रंग-बिरंगे भी होते हैं तथा इनको देखकर मन-मस्तिष्क प्रसन्न हो जाता है। पूजन में भी सुंदरता बिखर जाती है। इनकी सुंगध से चारों ओर का वातावरण खुशनुमा हो जाता है।
नैवेद्य इसके बाद देवी-देवता को भोग या नैवेद्य निवेदित किया जाता है। उनसे निवेदन किया जाता है कि हे प्रभु, इस भोग को ग्रहण कीजिए हम को कृतार्थ कीजिए यह भोग मीठा तथा शक्तिदायक है। फिर प्रसाद के रूप में इसी भोग को सभी ग्रहण करते हैं।नैवेद्य अर्पित करने से हमारा अतिथि सत्कार एवं प्रेम भाव प्रकट होता है। पूजन में हम मानते हैं कि देवी-देवता हमारे सामने उपस्थित है। अत: हम उनको भोग के लिए मिष्ठान दे जो उनकी कृपा से ही हमें प्राप्त हुआ है।हमारे भोजन विधान में भी यह नियम है कि भोजन शुरू करने से पहले कुछ मिष्ठान अवश्य खावें फिर अंत में भी मिष्ठान का प्रयोग करें।मिष्ठान्न का निर्माण दूध, घी, शक्कर से होता है। जो शक्तिदायक होने के साथ ही चिकना भी होता है जिससे हमारी आंतों में फसी पुरानी गंदगी साफ हो जाती है तथा कब्ज एवं गैस का नाश होता है। पेट की जलन शांत होती है तथा जठराग्नि मजबूत होती है।
फल - नैवेद्य के बाद देवी-देवताओं को फल चढ़ाए जाते हैं। फल पूर्णता का प्रतीक है। फल चढ़ाकर हम अपने जीवन को सफल बनाने की कामना भगवान से करते हैं। मौसम के अनुसार पांच प्रकार के फल भगवान को चढ़ाए जाते हैं। शक्ति अनुसार कम भी चढ़ सकते हैं।फल पूर्ण मीठे रसदार रंग और सुगंध से पूर्णता का प्रतीक है। हम भी रसदार, मीठे, नई रंग भरे जीवन जीएं तथा सफल होवें। जीवन में अच्छे कर्म करें। फल, जैसे सद्गुणों की खान है। वैसे ही हम भी बनें। क्योंकि अच्छे कार्य का फल अच्छा ही होता है।
तांबुल - तांबुल का अर्थ पान है। यह महत्वपूर्ण पूजन सामग्री है। फल के बाद तांबुल समर्पित किया जाता है। पान, मुख शुद्धि के साथ भोजन को पचाने में भी सहायक होता है। यह कई रोगों की रोकथाम में प्रयुक्त किया जाता है। अत: इसका पूजन सामग्री में प्रयोग होता है।पान खिलाकर हम अतिथि का सत्कार करते हैं। भोजन के बाद पान खिलाकर हम मेहमानवाजी की पूर्णता प्रदान करते हैं। मांगलिक कार्यों में भी पान का प्रयोग अनिवार्य होता है।पान में औषधिय गुण है। पान, तीक्ष्ण, कसैला, चटपटा, वातनाशक, भुख बढ़ाने वाला होता है। सर्दी-जुकाम, पेट दर्द की बीमारियां, गठान, सूजन में पान का पत्ता लाभकारी होता है।
दक्षिणा - तांबुल के बाद दक्षिणा अर्थात् द्रव्य समर्पित किया जाता है। भगवान भाव के भूखे हैं। अत: उन्हें द्रव्य से कोई लेना-देना नहीं है। द्रव्य के रूप में रुपए,स्वर्ण, चांदी कुछ की अर्पित किया जा सकता है। इसमें अपने आपका अर्पण भी भगवान के चरणों में किया जाता है।सीखाता है त्याग- दक्षिणा का भगवान के चरणों में समर्पण, हमें त्याग सीखाता है। धन में जो मोह है आसक्ति है। उससे हमारा मन हटने से सुख संतोष प्राप्त होता है। यह उनका ही दिया है। तथा उनको ही समर्पित हो यही इसका भाव है।
आरती - आरती यानी आर्त होकर, व्याकुल होकर भगवान को याद करना, उनका स्तवन करना। आरती पूजा के अंत में धूप, दीप, कपूर से की जाती है। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। आरती में एक, तीन, पांच, सात यानि विषम बत्तियों वाला दीपक प्रयोग किया जाता है।
मंत्र पुष्पांजली - मंत्रों द्वारा हाथों में फूल लेकर भगवान को पुष्प समर्पित किए जाते हैं तथा प्रार्थना की जाती है। भाव यह है कि इन पुष्पों की सुगंध की तरह हमारा यश सब दूर फैले तथा हम प्रसन्नता पूर्वक जीवन बीताएं।
परिक्रमा - आरती के बाद देवी-देवता की परिक्रमा की जाती है। प्रदक्षिणा का अर्थ है। अपना दाहिना भाग मूर्ति की ओर रखकर उसकी परिक्रमा करना। अलग-अलग देवी-देवता की परिक्रमा की अलग-अलग संख्या है। जैसे गणेशजी की तीन, विष्णु की चार, शंकर की आधी परिक्रमा आदि ईश्वरीय भावना से भगवान की मूर्ति या उनकी लीलाओं से जुड़े स्थानों की जब परिक्रमा करते हैं तो उनके गुण भी हममें उतरते है।
क्षमा प्रार्थना - क्षमा मांगने का आशय है कि हमसे कुछ भूल, गलती हो गई हो तो आप हमारे अपराध को क्षमा करें।क्षमा मांगने से हमारे अंदर विनम्रता आती है। अपनी गलती मानने की शक्ति आती है, और हम उसमें सुधार कर सकते हैं। जो व्यक्ति अपनी गलती मानते हैं और उनमें सुधार करते है वह विनम्र होने के साथ अपने जीवन में लक्ष्य को पाते हैं। तथा नई ऊंचाइयों को छूते हैं।क्षमा के बाद सब कुछ उन्हीं को अर्पण कर पूजन पूर्ण किया जाता है। वैदिक हिंदू पद्धति में यह पूजन षोडशोपचार का विधान है।
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भारतीय कर्मकाण्ड-परम्पराएँ एवं पूजा-पद्धति कर्मकाण्ड यज्ञ-संस्कार आदि कर्मकाण्ड भारतीय ऋषि-मनीषियों द्वारा लम्बी शोध एवं प्रयोग-परीक्षण द्वारा विकसित असामान्य क्रिया-कृत्य हैं । इनके माध्यम से महत् चेतना तथा मानवीय पुरुषार्थ की सूक्ष्म योग साधना को दृश्य-श्रव्य (ऑडियो विजुअल) स्वरूप दिया गया है । इसमें अनुशासनबद्ध स्थूल क्रिया-कलापों के द्वारा अंतरंग की सूक्ष्म शक्तियों को जाग्रत् एवं व्यवस्थित किया जाता है । औषधि निर्माण क्रम में अनेक प्रकार के उपचार करके सामान्य वस्तुओं म ें औषधि के गुण पैदा कर दिये जाते हैं । मानवीय अंतःकरण में सत्प्रवृत्तियों, सद्भावनाओं, सुसंस्कारों के जागरण, आरोपण, विकास व्यवस्था आदि से लेकर महत् चेतना के वर्चस्व बोध कराने, उनसे जुड़ने, उनके अनुदान ग्रहण करने तक के महत्त्वपूर्ण क्रम में कर्मकाण्डों की अपनी सुनिश्चित उपयोगिता है । इसलिए न तो उनकी उपेक्षा की जानी चाहिए और न उन्हें चिह्न पूजा के रूप में करके सस्ते पुण्य लूटने की बात सोचनी चाहिए । कर्मकाण्ड के क्रिया-कृत्यों को ही सब कुछ मान बैठना या उन्हें एकदम निरर्थक मान लेना, दोनों ही हानिकारक हैं । उनकी सीमा भी समझें, लेकिन महत्त्व भी न भूलें । संक्षिप्त करें, पर श्रद्धासिक्त मनोभूमि के साथ ही करें, तभी वह प्रभावशाली बनेगा और उसका उद्देश्य पूरा होगा । यज्ञादि कर्मकाण्ड द्वारा देव आवाहन, मंत्र प्रयोग, संकल्प एवं सद्भावनाओं की सामूहिक शक्ति से एक ऐसी भट्टी जैसी ऊर्जा पैदा की जाती है, जिसमें मनुष्य की अंतःप्रवृत्तियों तक को गलाकर इच्छित स्वरूप में ढालने की स्थिति में लाया जा सकता है । गलाई के साथ ढलाई के लिए उपयुक्त प्रेरणाओं का संचार भी किया जा सके, तो भाग लेेने वालों में वांछित, हितकारी परिवर्तन बड़ी मात्रा में लाये जा सकते हैं । इस विद्या का यत्किंचित् ही सही, पर ठीक दिशा में प्रयोग करने के कारण ही युग निर्माण अभियान के अंतर्गत सम्पन्न होने वाले यज्ञों में गुण, कर्म, स्वभाव परिवर्तन के संकल्पों के रूप में बड़ी संख्या में जन-जन द्वारा देवदक्षिणाएँ अर्पित की जाती हैं ।
इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों की ओर आकर्षित होती हैं, मन सुख की कल्पना में डूबना चाहता है, बुद्धि विचारों से प्रभावित होती है; परन्तु चित्त और अंतःकरण में जहाँ स्वभाव और आकांक्षाएँ उगती रहती हैं, उसे प्रभावित करने में ऊपर के सारे उपचार अपर्याप्त सिद्ध होते हैं । यज्ञ संस्कारादि ऐसे सूक्ष्म विज्ञान के प्रयोग हैं, जिनके द्वारा मनुष्य के व्यक्तित्व का कायाकल्प कर सकने वाली उस गहराई को भी प्रभावित, परिवर्तित किया जा सकता है । जो लोग युग निर्माण अभियान तथा उसके सूत्र संचालकों के व्यापक प्रयोग परीक्षण से परिचित हैं, उन्होंने लाखों व्यक्तियों के जीवन में इस विद्या को फलित होते देखा है । ऐसे अति महत्त्वपूर्ण कार्य को पूरी निष्ठा और पूरी जागरूकता से किया जाना चाहिए । उनमें मर्म समझने एवं उन्हें क्रियान्वित कर सकने की कुशलता तथा प्रवृत्ति विकसित करने का प्रयास मनोयोगपूर्वक बराबर करते रहना चाहिए ।
मूर्ति पूजा:- भारतीय संस्कृति में प्रतीकवाद का महत्वपूर्ण स्थान है । सबके लिए सरल सीधी पूजा-पद्धति को आविष्कार करने का श्रेय भारत को ही प्राप्त है । पूजा-पद्धति की उपयोगिता और सरलता की दृष्टि से हिन्दू धर्म की तुलना अन्य सम्प्रदायों से नहीं हो सकती । हिन्दू धर्म में ऐसे वैज्ञानिक मूलभूत सिद्धांत दिखाई पउ़ते हैं, जिनसे हिन्दुओं का कुशाग्र बुद्धि विवेक और मनोविज्ञान की अपूर्व जानकारी का पता चलता है । मूर्ति-पूजा ऐसी ही प्रतीक पद्धति है ।
मूर्ति-पूजा क्या है? पत्थर, मिट्टी, धातु या चित्र इत्यादि की प्रतिमा को माध्यस्थ बनाकर हम सर्वव्यापी अनन्त शक्तियों और गुणों से सम्पन्न परमात्मा को अपने सम्मुख उपस्थित देखते हैं । निराकार ब्रह्म का मानस चित्र निर्माण करना कष्टसाध्य है । बड़े योगी, विचारक, तत्ववेत्ता सम्भव है यह कठिन कार्य कर दिखायें,किन्तु साधारण जन के जिए तो वह नितांत असम्भव सा है । भावुक भक्तों, विशेषतः नारी उपासको ं के लिए किसी प्रकार की मूर्ति का आधार रहने से उपासना में बड़ी सहायता मिलती है । मानस चिन्तन और एकताग्रता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रतीक रूप में मूर्ति-पूजा की योजना बनी है । साधक अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान की कोई भी मूर्ति चुन लेता है और साधना अन्तःचेतना ऐसा अनुभव करती है मानो साक्षात् भगवान से हमारा मिलन हो रहा है ।
मनीषियों का यह कथन सत्य हे कि इस प्रकार की मूर्ति-पूजा में भावना प्रधान और प्रतिमा गौण है, तो भी प्रतिमा को ही यह श्रेय देना पड़ेगा कि वह भगवान की भावनाओं का उदे्रक और संचार विशेष रूप से हमारे अन्तःकरण में करती है । यों कोई चाहे, तो चाहे जब जहाँ भगवान को स्मरण कर सकता है, पर मन्दिर में जाकर प्रभु-प्रतिमा के सम्मुख अनायास ही जो आनंद प्राप्त होता है, वह बिना मन्दिर में जाये, चाहे, जब कठिनता से ही प्राप्त होगा । गंगा-तट पर बैठकर ईश्वरीय शक्तियों का जो चमत्कार मन में उत्पन्न होता है, वह अन्यत्र मुश्किल से ही हो सकता है ।
मूर्ति-पूजा के साथ-साथ धर्म मार्ग में सिद्धांतमय प्रगति करने के लिए हमारे यहाँ त्याग और संयम पर बड़ा जोर दिया गया है । सोलह संस्कार, नाना प्रकार के धार्मिक कर्मकाण्ड, व्रत, जप, तप, पूजा, अनुष्ठान,तीर्थ यात्राएँ, दान, पुण्य, स्वाध्याय, सत्संग ऐसे ही दिव्य प्रयोजन हैं, जिनसे मनुष्य में संयम ऐसे ही दिव्य प्रयोजन हैं, जिनसे मनुष्य में संयम और व्यवस्था आती है । मन दृढ़ बनकर दिव्यत्व की ओर बढ़ता है । आध्यात्मिक नियंत्रण में रहने का अभ्यस्त बनता है ।
मूर्ति-पूजा के पक्ष में प. दीनानाथ शर्मा के विचार बहुमूल्य हैं । शर्मा जी लिखते हैः-
”जड़ (मूल)ही सबका आधार हुआ करती है । जड़ सेवा के बिना किसी का भी कार्य नहीं चलता । दूसरे की आत्मा की प्रसन्नतार्थ उसके आधारभूत जड़ शरीर एवं उसके अंगों की सेवा करनी पड़ती है । परमात्मा की उपासना के लिए भी उसके आश्र्ाय स्वरूप जड़ प्रकृति की पूजा करनी पड़ती है । हम वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, प्रकाश आदि की उपासना में प्रचुर लाभ उठाते हैं, तब मूर्ति-पूजा से क्यों घबराना चाहिए? उसके द्वारा तो आप अणु-अणु में व्यापक चेतन (सच्चिदानंद) की पूजा कर रहे होते हैं । आप जिस बुद्धि को या मन को आधारीभूत करके परमात्मा का अध्ययन कर रहे होते हैं क्यों वे जड़ नहीं हैं? परमात्मा भी जड़ प्रकृति के बिना कुछ नहीं कर सकता, सृष्टि भी नहीं रच सकता । तब सिद्ध हुआ कि जड़ और चेतन का परस्पर संबंध है । तब परमात्मा भी किसी मूर्ति के बिना उपास्य कैसे हो सकता है? “
” हमारे यहाँ मूर्तियाँ मन्दिरों में स्थापित हैं, जिनमें भावुक जिज्ञासु पूजन, वन्दन अर्चन के लिए जाते हैं और ईश्वर की मूर्तियों पर चित्त एकाग्र करते हैं । घर में परिवार की नाना चिन्ताओं से भरे रहने के कारण पूजा, अर्चन, ध्यान इत्यादि इतनी तरह नहीं हो पाता, जितना मन्दिर के प्रशान्त स्वच्छ वातावरण में हो सकता है । अच्छे वातावरण का प्रभाव हमारी उत्तम वृत्तियों को शक्तिवान् बनाने वाला है । मन्दिर के सात्विक वातावरण में कुप्रवृत्तियाँ स्वयं फीकी पड़ जाती हैं । इसलिए हिन्दू संस्कृति में मन्दिर की स्थापना को बड़ा महत्व दिया गया है ।”
कुछ व्यक्ति कहते हैं कि मन्दिरों में अनाचार होते हैं । उनकी संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती रही है । उन पर बहुत व्यय हो रहा है । अतः उन्हें समाप्त कर देना चाहिए । सम्भव है इनमें से कुछ आक्षेप सत्य हों, किन्तु मन्दिरों को समाप्त कर देने या सरकार द्वारा जब्त कर लेने मात्र से क्या अनाचार दूर हो जायेंगे? यदि किसी अंग में कोई विकार आ जाय, तो क्या उसे जड़मूल से नष्ट कर देना उचित है? कदापि नहीं । उसमें उचित परिष्कार और सुधार करना चाहिए । इसी बात की आवश्यकता आज हमारे मन्दिरों में है । मन्दिर स्वेच्छ नैतिक शिक्षण के केन्द्र रहें । उनमें पढ़े- लिखे निस्पृह पुजारी रखे जायं, जो मूर्ति-पूजा कराने के साथ-साथ जनता को धर्म-ग्रन्थों, आचार शास्त्रों, नीति,ज्ञान का शिक्षण भी दें और जिनका चरित्र जनता के लिए आदर्श रूप हो ।
- पं श्री राम शर्मा “आचार्य”
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|| कल्याण प्राप्ति के उपाय || कल्याण मुक्ति को कहते हैं | इसे परम पद या परम गति भी कहते हैं | इसको प्राप्त करने के तीन प्रधान उपाय हैं | निष्काम कर्म योग , ज्ञान योग अर्थात सांख्य - योग , और भक्ति -योग अर्थात ध्यान -योग | इनमें भक्ति का सा धन स्वतंत्र भी किया जा सकता है और कर्म योग व ज्ञान योग के साथ भी | वर्तमान समय में ,सबसे सुगम और उत्तम उपाय , भक्ति सहित निष्काम कर्म -योग है | इसका बड़ा सुन्दर उपदेश गीता [ श्लोक १८ / ५६ - ६६ ] में किया गया है | कैसा दिव्य उपदेश है | यदि कोई सज्जन इन श्लोकों के अर्थ का मनन कर ,उसके अनुसार चलना आरंभ कर दे तो उनको परम कल्याण - मोक्ष की प्राप्ति बहुत ही सुगमता से हो सकती है | साधक का काम केवल संसार से विमुख होकर , भगवान के सम्मुख होना है | इसके बाद जो कमी रह जायेगी ,वह भगवान की कृपा से दूर हो जाएगी | मनुष्य जब तक शरीर रुपी यंत्र के साथ , मैं और मेरापन का संबंध मानता है , तब तक ईश्वर उसे उसके स्वभाव के अनुसार जन्म मरण रूप संसार - चक्र में घुमाता रहता है | सबके हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित ईश्वर ही भगवान श्री कृष्ण हैं और भगवान श्री कृष्ण ही सबके हृदय में स्थित ईश्वर हैं [ गीता श्लोक ४ / ६ ; ५ / २९ ; ८ / ४ ; ९ / २४ ; १५ / १५ ] | भगवान अर्जुन को अपनी तरफ [ सगुण - साकार ] खींचना चाहते हैं क्योंकि निराकार में साकार नहीं आता , पर साकार में निराकार भी आ जाता है | मैं भगवान का ही हूँ , और भगवान ही मेरे हैं , इसको स्वीकार कर लेना , भगवान का आश्रय है | मेरा कुछ नहीं है , मुझे कुछ नहीं चाहिए , इसको स्वीकार कर लेना " स्व " का आश्रय है | पदार्थ और क्रिया [ भोग और संग्रह ] केवल दूसरों की सेवा के लिए है , इसको स्वीकार कर लेना " धर्म " का आश्रय है | भगवान का आश्रय " भक्ति - योग " है ; स्व का आश्रय " ज्ञान योग " है और धर्म का आश्रय " कर्म -योग " है | इनमें भक्ति योग ही सर्व - श्रेष्ट है क्योंकी मूल में हम भगवान के ही अंश हैं | यह भगवदआश्रय [ शरणागति ] ही गीता का सार है , जिसे भगवान ने विशेष कृपा करके कहा है | || इति ||
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| सर्वोत्तम एवं सुगम साधन ' भक्तियोग ' का वर्णन ||
जो मनुष्य मन , इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके कर्मयोग , ज्ञानयोग या ध्यानयोग का साधन करने में अपने को समर्थ नहीं समझता हो , ऐसे साधक के लिए सुगमता से परमपद की प्राप्ति करानेवाले भक्तियोग का संक्षेप में वर्णन करते हुए भगवान गीता [ ५ / २९ ] में कहते हैं " मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों का भोगनेवाला , सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा सम्पूर्ण भूत - प्राणियों का सुहृद अर्थात स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी , ऐसा तत्व से जानकर शान्ति को प्राप्त होता है |" अहिंसा , सत्य आदि धर्मों का पालन , देवता , ब्राह्मण , माता - पिता आदि गुरुजनों का सेवन - पूजन , दीन - दू:खी , गरीब और पीड़ित जीवों की स्नेह और आदरयुक्त सेवा और उनके दू:खनाश के लिए किये जानेवाले उपयुक्त साधन एवं यज्ञ , दान आदि जितने भी शुभकर्म हैं , सभी का समावेश ' यज्ञ ' और ' तप ' शब्दों में समझना चाहिए | भगवान सबके आत्मा हैं [ १० / २० ] ; अतएव देवता , ब्राह्मण , दीन - दू:खी आदि के रूप में स्थित होकर भगवान ही समस्त सेवा - पूजा आदि ग्रहण कर रहे हैं | इसलिए वे ही समस्त यज्ञ और तपों के भोक्ता हैं [ ९ / २४ ] | जो पुरुष भगवान के तत्व और प्रभाव को जानता है , वह सबके अंदर आत्मरूपसे विराजित भगवान को ही देखता है | इंद्र , वरुण , कुबेर , यमराज आदि जितने भी लोकपाल हैं तथा विभिन्न ब्रह्मांडों में अपने - अपने ब्रह्मांड का नियंत्रण करनेवाले जितने भी ईश्वर हैं , भगवान उन सभी के स्वामी और महान ईश्वर हैं | इसीसे श्रुति में कहा है ' उन ईश्वरों के भी परम महेश्वर को ' अपनी अनिर्वचनीय मायाशक्ति द्वारा भगवान अपनी लीला से ही सम्पूर्ण अनंतकोटि ब्रह्मांडों की उत्पत्ति , स्थिति और संहार करते हुए सबको यथायोग्य नियंत्रण में रखते हैं और ऐसा करते हुए भी वे सबसे ऊपर ही रहते हैं | इस प्रकार भगवान को सर्वशक्तिमान , सर्वनियंता , सर्वाध्यक्ष और सर्वेश्वरेश्वर समझना ही उन्हें ' सर्वलोक - महेश्वर ' समझना है | भगवान तो सदा - सर्वदा सभी प्रकार से पूर्णकाम हैं [ ३ / २२ ] ; तथापि दयामय स्वरूप होने के कारण वे स्वाभाविक ही सब पर अनुग्रह करके सबके हित की व्यवस्था करते हैं और बार - बार अवतीर्ण होकर नाना प्रकार के ऐसे विचित्र चरित्र करते हैं , जिन्हें गा - गाकर ही लोग तर जाते हैं | उनकी प्रत्येक क्रिया में जगत का हित भरा रहता है | भगवान जिनको मारते या दंड देते हैं उन पर भी दया ही करते हैं , उनका कोई भी विधान दया और प्रेम से रहित नहीं होता | इसीलिए भगवान सब भूतों के सुहृद हैं | जो पुरुष इस बात को जान लेता है और विश्वास कर लेता है की ' भगवान मेरे अहेतुक प्रेमी हैं , वे जो कुछ भी करते हैं , मेरे मंगल के लिए ही करते हैं |' वह प्रत्येक अवस्था में जो कुछ भी होता है , उसको दयामय परमेश्वर का प्रेम और दया से ओत - प्रोत मंगलविधान समझकर सदा ही प्रसन्न रहता है | इसलिए उसे अटल शान्ति मिल जाती है | इस प्रकार जो भगवान को यज्ञ - तपों का भोक्ता , समस्त लोकों के महेश्वर और समस्त प्राणियों के सुहृद - इन तीनों लक्षणों से युक्त जानता है , वही शान्ति को प्राप्त होता है | श्रधा और प्रेम के साथ महापुरुषों का संग , सत - शास्त्रों का श्रवण - मनन और भगवान की शरण होकर अत्यंत उत्सुकता के साथ उनसे प्रार्थना करनेपर उनकी दया से मनुष्य भगवान के स्वरूप , प्रभाव , तत्व और गुणों को समझकर उनका अनन्य भक्त हो सकता है | भगवान के उपरोक्त तीन लक्षणों में से किसी एक लक्षण से युक्त समझनेवाले को भी शान्ति मिल जाती है क्योंकि जो किसी एक लक्षण को भी भली - भाँती समझ लेता है , वह अनन्यभाव से भजन किये बिना रह ही नहीं सकता | भजन के प्रभाव से उस पर भगवत - कृपा बरसने लगती है और भगवत्कृपा से वह अत्यंत ही शीघ्र भगवान के स्वरूप , प्रभाव , तत्व तथा गुणों को समझकर पूर्ण शान्ति को प्राप्त हो जाता है | || इति ||
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