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हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। हिन्दुत्व को प्राचीन काल में सनातन धर्म कहा जाता था। हिन्दुओं के धर्म के मूल तत्त्व सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान आदि हैं जिनका शाश्वत महत्त्व है। अन्य प्रमुख धर्मों के उदय के पूर्व इन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर दिया गया था। इस प्रकार हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था। मान्य ज्ञान जिसे विज्ञान कहा जाता है प्रत्येक वस्तु या विचार का गहन मूल्यांकन कर रहा है और इस प्रक्रिया में अनेक विश्वास, मत, आस्था और सिद्धान्त धराशायी हो रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आघातों से हिन्दुत्व को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसके मौलिक सिद्धान्तों का तार्किक आधार तथा शाश्वत प्रभाव है। आर्य समाज जैसे कुछ संगठनों ने हिन्दुत्व को आर्य धर्म कहा है और वे चाहते हैं कि हिन्दुओं को आर्य कहा जाय। वस्तुत: 'आर्य' शब्द किसी प्रजाति का द्योतक नहीं है। इसका अर्थ केवल श्रेष्ठ है और बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य की व्याख्या करते समय भी यही अर्थ ग्रहण किया गया है। इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ उदात्त अथवा श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है। प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था। वस्तुत: प्राचीन संस्कृत और पालि ग्रन्थों में हिन्दू नाम कहीं भी नहीं मिलता। यह माना जाता है कि परस्य (ईरान) देश के निवासी 'सिन्धु' नदी को 'हिन्दु' कहते थे क्योंकि वे 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे। धीरे-धीरे वे सिन्धु पार के निवासियों को हिन्दू कहने लगे। भारत से बाहर 'हिन्दू' शब्द का उल्लेख 'अवेस्ता' में मिलता है। विनोबा जी के अनुसार हिन्दू का मुख्य लक्षण उसकी अहिंसा-प्रियता है हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:। एक अन्य श्लोक में कहा गया है ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय: गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:। ॐकार जिसका मूलमंत्र है, पुनर्जन्म में जिसकी दृढ़ आस्था है, भारत ने जिसका प्रवर्तन किया है, तथा हिंसा की जो निन्दा करता है, वह हिन्दू है। चीनी यात्री हुएनसाग् के समय में हिन्दू शब्द प्रचलित था। यह माना जा सकता है कि हिन्दू' शब्द इन्दु' जो चन्द्रमा का पर्यायवाची है से बना है। चीन में भी इन्दु' को इन्तु' कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व देते हैं। राशि का निर्धारण चन्द्रमा के आधार पर ही होता है। चन्द्रमास के आधार पर तिथियों और पर्वों की गणना होती है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिन्दु' कहने लगे। मुस्लिम आक्रमण के पूर्व ही 'हिन्दू' शब्द के प्रचलित होने से यह स्पष्ट है कि यह नाम मुसलमानों की देन नहीं है। भारत भूमि में अनेक ऋषि, सन्त और द्रष्टा उत्पन्न हुए हैं। उनके द्वारा प्रकट किये गये विचार जीवन के सभी पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। कभी उनके विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं और कभी परस्पर विरोधी। हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रही है। इसे समझने के लिए हम किसी एक ऋषि या द्रष्टा अथवा किसी एक पुस्तक पर निर्भर नहीं रह सकते। यहाँ विचारों, दृष्टिकोणों और मार्गों में विविधता है किन्तु नदियों की गति की तरह इनमें निरन्तरता है तथा समुद्र में मिलने की उत्कण्ठा की तरह आनन्द और मोक्ष का परम लक्ष्य है। हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। हिन्दू समाज किसी एक भगवान की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं हैं, किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित या किसी एक पुस्तक में संकलित विचारों या मान्यताओं से बँधा हुआ नहीं है। वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता, किसी एक प्रकार की मजहबी पूजा पद्धति या रीति-रिवाज को नहीं मानता। वह किसी मजहब या सम्प्रदाय की परम्पराओं की संतुष्टि नहीं करता है। आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं । कोई किसी भगवान में विश्वास करे या किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करे फिर भी वह हिन्दू है। यह एक जीवन पद्धति है; यह मस्तिष्क की एक दशा है। हिन्दुत्व एक दर्शन है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त उसकी मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकता की भी पूर्ति करता है।
जब शंकर के हृदय से ’सौन्दर्य लहरी’ फूट पड़ी थी आचार्य शंकर की दिग्विजय का एक मर्मस्पर्शी प्रसंग आचार्य शंकर व शिष्य "प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण चाहते हो संन्यासी?" तांत्रिक अभिनव शास्त्री का क्रुद्ध स्वर शास्त्रार्थ सभा में गूँजा, तो उपस्थित पंडित वर्ग में छूट रही हल्की वार्ता की फुहारें भी शांत हो गयीं। "प्रत्यक्ष तो कुछ नहीं आचार्य, शास्त्रार्थ में प्रत्यक्ष है तर्क और प्रमाण है प्रतितर्क", युवा संन्यासी शंकर आत्मविश्वास भरी हँसी हँस पड़े, "तर्क नहीं तो सारी कल्पना व्यर्थ है, ऐसी स्थिति में पराजय पत्र पर हस्ताक्षर ही उचित होगा।" "मैं हस्ताक्षर करूँ, पराजय पत्र पर? मदांध युवक।" उत्तरीय झटक कर अभिनव शास्त्री क्रोधपूर्वक त्रिपुंड के स्वेद विन्दु पोंछने लगे। "ये बाहुएँ पराजय पत्र लिखेंगी जिनके द्वारा हवन कुण्ड में एक आहुति पड़े, तो आर्यावर्त में खंड प्रलय का हाहाकार मच सकता है। यह मस्तक पराजय वेदना से झुकेगा, जो अपनी तंत्र साधना के अहम् से त्रिलोक को झुकाने की सामर्थ्य रखता है?" "स्पष्ट ही यह सारा प्रलाप आहत मान का प्रण भरने के लिए है, आचार्य! किन्तु शंकर को इससे भय नहीं। उसे तो शास्त्रार्थ में पराजित विद्वान से पराजय पत्र प्राप्त करने में ही..." "दे सकता हूँ, तू चाहे तो वह भी दे सकता हूँ," अभिनव शास्त्री झंझा में पड़े बेंत की तरह काँप रहे थे, "किंतु समस्त पंडित जन ध्यानपूर्वक सुनें, मेरा यह पराजय-पत्र इस जिह्वापटु, तर्क दुष्ट, पल्लव ग्राहि मुंडित के समक्ष तब तक तंत्रशास्त्र की पराजय के रूप में न लिया जाय......." "कब तक आचार्य श्रेष्ठ?" शंकर के मुख पर अभी भी व्यंग्य की सहस्रधार फूट रही थी। " "जब तक मेरा तंत्र रक्त से इस पराजय पत्र का कलंक लेख न धो डाले।" "स्वीकार है, किंतु अभी तो उस ’कलंक लेख’ पर हस्ताक्षर कर ही दें तंत्राचार्य?" युवक शंकर ने उपस्थित पंडित वर्ग के चेहरे पर अपने लिए त्रास और भय की भावना पढ़कर भी अपना हठ न छोड़ा। आश्रम का सारा वातावरण पीड़ा और निराशा भरी मृत्यु का साकार रूप बन गया। कुशासन पर पट लेटे योगी शंकराचार्य के मुँह से निकली आह नश्वर सांसारिक वेदना की क्षतिक विजय का घोष कर रही थी। वैद्यों, शल्य शास्त्रियों ने उन्हें देखकर निराश भाव से सर हिला दिया। शास्त्रार्थ में अभिनव शास्त्री का मन मर्दन करने के दूसरे ही दिन भगन्दर का जो पूर्वरूप प्रकट हुआ, वह अब योगी शंकर को असाध्य सांघातिक उपासर्गों के यमदूतों द्वारा धमका रहा था। "आह...माँ....माँ...." कष्ट से करवट बदलते संन्यासी ने अपनी वेदना का चरम निवेदन ममतामयी जननी के दरबार में करके संसारी पुरुषों-सा रूप प्रकट कर दिया। "बहुत पीड़ा है गुरुदेव?" संन्यासी के रूप में शंकर के अनुयायी से सुरेश्वराचार्य और गृहस्थ के रूप में विदुषी शारदा के पति कर्मकांडी मंडन मिश्र के नाम से विख्यात एक शिष्य ने सह अनुभूति से पीड़ित हो पूछा। "पीड़ा नहीं, मृत्यु का साक्षात रूप," वेदना बढ़ी होने पर भी शंकर मुस्करा उठे, "अभिनव आचार्य ने सत्य ही कहा था, किंतु मैंने तंत्र जैसी प्रत्यक्ष विद्या के लिए प्रमाण का हठ किया। अब प्रमाण मिला भी तो ऐसी शोचनीय दशा में जब मैं उसे स्वीकार भी न कर पाऊँगा।" "क्या रहस्य है गुरुदेव?" चरण-सेवा छोड़कर उत्सुक सुरेश्वर आगे खिसक आये। "कुछ नहीं। अभिमानी तांत्रिक ने अपनी पराजय का प्रायश्चित कराया है, शंकर से, एकांत वन की गुफा में बैठा वह मारण प्रयोग में लिप्त है।" "ओह आर्य!" जगद्गुरु के चारों आद्य शिष्य आक्रोशमद पीकर मतवाले हो उठे। "हाँ आयुष्मानों! तांत्रिक का मारण न सह सका तो यह हंस अब हस्त पिंजर में न रहेगा।" अन्य तीनों शिष्यों ने तो चिन्ता मग्न हो गुरु चरणों में सर झुका कर विवशता प्रकट कर दी, किंतु चौथा अपने चेहरे पर प्रतिहिंसा की कठोर रेखाएँ छिटकाता वन प्रदेश को चल दिया। प्रहर भर पश्चात्। निर्जन वन की उस झाड़-झंखाड़ भरी पहाड़ी गुफा का अंधकार भयंकर चीत्कार से सिहर उठा। शंकर का पुतला बनाकर उसके मर्मस्थानों में लौह कीले गाड़े हुए मारण प्रयोग में रत अभिनव पर प्रतिहिंसा विक्षिप्त शिष्य ने खड्ग का भरपूर प्रहार किया था। कुछ देर पश्चात् रक्त सने शस्त्र से लाल बिन्दु टपकाता वह गुरु के निकट उपस्थित हुआ। "मैंने उसका शिरच्छेद कर दिया देव", शिष्य ने रक्त सना खड्ग शंकर के चरणों में रख कर हिंसा वीभत्स स्वर में कहा, "उस पिशाच विद्यादक्ष नर राक्षस का यही प्रतिकार........" "शांतं पापं...ये क्या किया मूर्ख," पीड़ा की अवहेलना कर जगद्गुरु बलात आसन पर उठ बैठे, " तंत्र विद्या-पारंगत उस अकल्मष मनीषी का वध कर तूने भरत खंड के एक नर रत्न का विनाश कर दिया।" "इस हत्या का प्रायश्चित कर लूँगा गुरुदेव, किंतु आपका शरीर न रहता तो भरत खंड का सद्यः ज्वलित ज्ञान दीप ही बुझ जाता। उस हानि का शोक भला कैसे.....।" "उस हानि का पातक भी तेरे ही भाग्य में था," करुणा मिश्रित विचित्र हँसी हँस कर शंकर ने कहा, "मारण प्रयोग द्वारा उत्पन्न यह व्रण त्रिलोकी का कोई शल्य वैद्य न पूरित कर सकेगा। अभिनव के जीवित रहते मेरे जीवन की भी क्षीण आशा थी, किंतु तूने उस पर तुषारापात कर दिया।" पश्चाताप हत शिष्य अवाक् था। संन्यासी शंकर ने उसके मन का दूसरा संकल्प ’अपने ही शस्त्र से आत्मघात’ का आभास पा खड्ग उठा कर अन्य शिष्य को दे दिया। मर्म विधे पक्षी के पीड़ित डैनों की अन्तिम उड़ान, जगन्माता के अभयकारी आँचल का नीड़। आद्य शंकराचार्य के अन्तर से उठता स्वर आत्मविश्वास में परिवर्तित हो चुका था। एक तांत्रिक के सांघातिक प्रयोग का निवारण उस ’महाभय विनाशिनि, महाकारुण्य रूपिणि’ के अतिरिक्त और कौन कर सकता था! और आत्मविश्वास से प्रेरित योगी शंकर के मुख से मातृ-शक्ति की वंदना के बोल ’सौंदर्य लहरी’ बन कर फूट निकले। जगद्गुरु के एक-एक श्लोक व्रणरोपक लेप बनकर, असाध्य व्रण को भरने लगे। स्तुतिकार शंकर ने अपनी करुणार्द्र वाणी में पहली बार शक्ति के सहज स्नेहमय रूप को स्वीकार किया और शक्ति के बिना अपने पूर्व प्रतिपादित शिव को ’शव’ के समान अर्थहीन, निस्पंद माना। और एक घन घिरी काली रात जब सारा देश निद्रारूपिणी प्रकृति माँ की गोद में बेसुध था, योगी शंकर ने अपने बाल सुलभ अपराध की स्वीकारोक्ति से माँ के करुण हृदय के तार-तार झंकृत कर दिए। ’सौंदर्य लहरी’ का सौंवा श्लोक पूरा होने से पहले ही जगन्माता ने अपने वरद पुत्र को असाध्य भगंदर से मुक्त कर दिया. |
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![]() क्या स्त्रियों को वेदाधिकार नहीं है ? सकते हैं, तो फिर माताओं को वेदाध्ययन का अधिकार न देने का कोई औचित्य नहीं ! ३. बृहदारण्यकोपनिषद् में गार्गी एवं मैत्रेयी के याज्ञवल्क्यमुनि के साथ संवाद को देख कर कहीं से भी नहीं लगता कि वे अपने वैदिक ज्ञान में यजुर्वेद के इस श्रेष्ठतम मुनि से कहीं भी कम होंगी ! ४. इसके अतिरिक्त स्मृतिवाक्यों ने स्वीकार किया कि प्राचीन काल में स्त्रियों को गायत्री मन्त्र भी दिया जाता था ओर मौञ्जी बन्धन भी किया जाता था ! पुरा कल्पे तु नारीणां मौज्ञ्जी बन्धनमिष्यते इत्यादि ! ५. पत्नी शब्द का संस्कृत में अर्थ ही होता है पति के साथ यज्ञ में संयुक्त होने वाली…… हम जानते हैं कि वैदिक काल में कोई भी यज्ञ यजमानी के बिना नहीं हो सकता था…… अब अगर उसको वेद का ज्ञान नहीं होगा, तो वह वैदिक यज्ञ कैसे सम्पन्न करेगी ? ६. हां, कुछ अपेक्षाकृत आधुनिक धर्मशास्त्रों में और पुराणों में स्पष्ट निषेध है ! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जब विदेशियों के आक्रमण के परिणाम स्वरूप स्त्रियों का जीवन भारत में असुरक्षित होता चला गया है, तभी घूंघट से ले कर सारे सीमित करने वाले नियम उनकी सुरक्षा के लिये वैसे ही बनाये गये हैं ! जैसे आज से कुछ वर्ष पहले तक फिलिस्तीन की मुसलमान लड़कियां कभी अपने बाल और सिर नहीं ढकती थी, पर अब इतने अधिक अत्याचार के उपरान्त अधिकतर अपनी सुरक्षा के लिये उन्हें ढकने लगी हैं ! ७. ऋग्वेद १०:८५ के सम्पूर्ण मन्त्रों की ऋषिकाएँ ” सूर्या सावित्री” हैं ! ८. ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची ब्रह्म देवता के २४ अध्याय में इस प्रकार है - घोषा गोधा विश्ववारा अपालोपनिषन्नित ! ब्रह्म जाया जहुर्नाम अगस्तस्य स्वसादिती !!८४!! इन्द्राणी चेन्द्र माता चा सरमा रोमशोर्वशी ! लोपामुद्रा च नद्यस्य यमी नारी च शाश्वती !!८५!! श्री लक्ष्मिः सार्पराज्ञी वाक्श्रद्धा मेधाच दक्षिण ! रात्रि सूर्या च सावित्री ब्रह्मवादिन्य ईरितः !!८६!! ९. ऋग्वेद के १०:१३४, १०:३९, १९:४०, ८:९१, १०:५, १०:१०७, १०:१०९, १०:१५४, १०:१५९, १०:१८९, ५:२८, ८:९१ अदि सूक्तों की मंत्रद्रष्टा यह ऋषिकाएँ हैं ! १०. आचार्य श्री मध्वाचार्य जी ने महाभारत निर्णय में द्रौपदी की विद्वता का वर्णन करते हुए लिखा है :- वेदाश्चप्युत्तम स्त्रीभिः कृष्णात्ताभिरिहाखिलाः ! इससे यह प्रमाणित होता है कि महाभारत काल में भी स्त्रियाँ वेदाध्ययन करती थीं ! ११. तैत्तिरीय ब्रह्मण में सोम द्वारा ‘सीता सावित्री’ ऋषिका को तीन वेद देने का वर्णन विस्तारपूर्वक आता है ! (तैत्तिरीय ब्राह्मण १:३:१० ) १२. वभूव श्रीमती राजन शांडिलस्य महात्मनः ! सुता धृतव्रता साध्वी, नियता ब्रह्मचारिणी !! साधू तप्त्वा तपो घोरे दुश्चरम स्त्री जनेन ह ! गता स्वर्ग महाभागा देव ब्रह्मण पूजिता !! महाभारत , शल्य पर्व ५४:९ !! अर्थात:- महात्मा शांडिल्य की पुत्री ‘श्रीमती’ थी, जिसने व्रतों को धारण किया ! वेदाध्ययन में निरंतर प्रवृत्त थी! अत्यंत कठिन तप करके वह देवी ब्राह्मणों से पूजित हुई और स्वर्ग सिधारीं ! १३. अत्र सिद्धा शिवा नाम ब्राह्मणी वेद पारगा ! अधीत्य सकलान वेदान लेभेSसंदेहमक्षयम !! महाभारत, उद्योग पर्व १९०:१८ !! अर्थात:- शिवा नामक ब्राह्मणी वेदों में पारंगत थीं, उसने सब वेदों को पढ़कर मोक्ष प्राप्त किया ! १४. विष्णु पुराण १:१० और १८:१९ में तथा मार्कंडेय पुराण अध्याय २२ में भी इस प्रकार ब्रह्मवादिनी (वेद और ब्रह्म का उपदेश करने वाली) महिलाओं का वर्णन है ! १५. आचार्य शंकर को भारती देवी के साथ शास्त्रार्थ करना पड़ा था ! उसने ऐसा अद्भुत शास्त्रार्थ किया था कि बड़े-बड़े विद्वान भी अचंभित रह गए थे ! शंकर-दिग्विजय में भारती देवी के सम्बन्ध लिखा है- सर्वाणि शास्त्राणि षडंग वेदान, कव्यादिकान वेत्ति, परंच सर्वम ! तन्नास्ति नो वेत्ति यदत्र वाला, तस्मादभुच्चित्र पदम् जनानाम !! शंकर दिग्विजय ३:१६ !! अर्थात:- भारती देवी सर्वशास्त्र तथा अंगों सहित सब वेदों और काव्यों को जानती थीं ! उससे बढ़कर श्रेष्ठ और विद्वान् स्त्री और न थी ! आज जिस प्रकार स्त्रियों के शास्त्राध्ययन पर रोक लगी जाती है, यदि उस समय ऐसे प्रतिबन्ध होते तो याज्ञवल्क्य और शंकराचार्य से शास्त्रार्थ करने वाली स्त्रिया किस प्रकार हो सकती थीं ? ऐसे अनेकों प्रमाण मिलते हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह यज्ञ करती और कराती थीं! वे यज्ञ-विद्या, ब्रह्म-विद्या आदि में पारंगत थीं ! वेद, उपनिषद् आदि धर्मशास्त्रों पर स्त्रियों का सामान अधिकार सर्वदा रहा है ! इस विषय पर विस्तृत जानकारी के लिए पं श्रीराम शर्मा “आचार्य” जी की पुस्तक “वेदों पर स्त्रियों का अधिकार” का अध्ययन करें ! //\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\ भारतीय धर्म-दर्शन की परंपरा और भक्ति आंदोलन े दूर हो जाना. सामान्यत इसका अर्थ उस स्थिति से लिया जाता है जब आत्मा परमात्मा में मिलकर उसका अभिन्न-अटूट हिस्सा बन जाती है. दोनों के बीच का सारा द्वैत विलीन हो जाता है. यह जल में कुंभ और कुंभ में जल की-सी स्थिति है. जल घड़े में है, घड़ा जल में. घड़ा यानी पंचमहाभूत से बनी देह. पानी की दो सतहों के बीच फंसी मिट्टी की पतली-सी क्षण-भंगुर दीवार, जिसकी उत्पत्ति भी जल यानी परमतत्त्व के बिना संभव नहीं. वेदांत की भाषा में जो माया है. तो उस पंचमहाभूत से बने घट के मिटते ही उसमें मौजूद सारा जल सागर के जल में समा जाता है. सागर में मिलकर उसी का रूप धारण कर लेता है. यही मोक्ष है जिसका दूसरा अर्थ संपूर्णता भी है, आदमी को जब लगने लगे कि जो भी उसका अभीष्ट था, जिसको वह प्राप्त करना चाहता था, वह उसको प्राप्त हो चुका है. उसकी दृष्टि नीर-क्षीर का भेद करने में प्रवीण हो चुकी है. जिसके फलस्वरूप वह इस संसार की निस्सारता को, उसके मायावी आवरण को जान चुका है. साथ ही वह इस संसार के मूल और उसके पीछे निहित परमसत्ता को भी पहचानने लगा है. उसे इतना आत्मसात कर चुका है कि उससे विलगाव पूर्णतः असंभव है. अब कोई भी लालच, कोई भी प्रलोभन कोई भी शक्ति अथवा डर उसको अपने निश्चय से डिगा नहीं सकता. इस बोध के साथ ही वह मोक्ष की अवस्था में आ जाता है. तब उसको जन्म-मरण के चक्र से गुजरना नहीं पड़ता.
मुक्ति का दूसरा अर्थ है आत्मा की परमात्मा के साथ अटूट संगति. दोनों में ऐसी अंतरगता जिसमें द्वैत असंभव हो जाए. परस्पर इस तरह घुल-मिल जाना कि उनमें विलगाव संभव ही न हो. जब ऐसी मुक्ति प्राप्त हो, तब कहा जाता है कि सांसारिक व्याधियों से दूर मन पूरी तरह निस्पृह-निर्लिप्त हो चुका है. जैन दर्शन में इस अवस्था को कैवल्य’ कहा गया है. कैवल्य यानी अपनेपन की समस्त अनुभूतियों का त्यागकर ‘केवल वही’ का बोध रह जाना. यह बोध हो जाना कि मैं भी वहीं हूं और एक दिन उसी का हिस्सा बन जाऊंगा. उस समय न कोई इच्छा होगी न आकांक्षा. न कोई सांसारिक प्रलोभन मुझे विचलित कर पाएगा. इसी स्थिति को बौद्ध दर्शन में ‘निर्वाण’ की संज्ञा दी गई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है—‘बुझा हुआ’. व्यक्ति जब इस संसार को जान लेता है, जब वह संसार में रहकर भी संसार से परे रहने की, कीचड़ में कमल जैसी निर्लिप्तता प्राप्त कर लेता है, तब मान लिया जाता है कि वह इस संसार को जीत चुका है. इच्छा-आकांक्षाओं और भौतिक प्रलोभनों से सम्यक मुक्ति ही निर्वाण है. गीता में इस स्थिति को कर्म, अकर्म और विकर्म के त्रिकोण के द्वारा समझाने का प्रयास किया गया है. उसके अनुसार संसार में सभी व्यक्तियों के लिए कुछ न कुछ कर्म निर्दिष्ट हैं. जब तक यह मानव देह है, कर्तव्य से सरासर मुक्ति असंभव है. क्योंकि देह सांस लेने का, आंखें देखने का कान, सुनने का काम करती रहती है. संन्यासी को भी इन कर्तव्यों से मुक्ति नहीं. जब तक प्राण देह में हैं, तब तक उसको देह का धर्म निभाना ही पड़ता है. तब मुक्ति का क्या अभिप्राय है! बुद्ध कहते हैं कि देह में रहकर भी देह से परे होना संभव है. हालांकि उसके लिए लंबी साधना और नैतिक आचरण की जरूरत पड़ती है. मोक्ष और निर्वाण दोनों ही अवस्थाओं में जीव जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा पा लेता है. लेकिन मोक्ष मृत्यु के पार की अवस्था है. जबकि निर्वाण के लिए जीवन का अंत अनिवार्य नहीं. गौतम बुद्ध ने सदेह अवस्था में निर्वाण प्राप्त किया था. जैन दर्शन के प्रवत्र्तक महावीर स्वामी भी जीते जी कैवल्य-अवस्था को पा चुके थे. किंतु सभी तो उनके जैसे तपस्वी-साधक नहीं हो सकते. तब साधारणजन क्या करें. तो उसके लिए सभी धर्म-दर्शनों में एक ही मंत्र दिया गया है. और वह है अनासक्ति. संसार में रहकर भी संसार के बंधनों से मुक्ति, धन-संपत्ति की लालसा, संबंधों और मोहमाया के बंधनों से परे हो जाना, अपने-पराये के अंतर से छुट्टी पा लेना, जो भी अपने पास है उसको परमात्मा की अनुकंपा की तरह स्वीकार करना और अपनी हर उपलब्धि को ईश्वर के नाम करते जाना, यही मुक्ति तक पहुंचने का सहजमार्ग है. इसी को सहजयोग कहा गया है. उस अवस्था में कामनाओं का समाजीकरण होने लगता है. इच्छाएं लोकहित के साथ जुड़कर पवित्र हो जाती हैं. उस अवस्था में व्यक्ति का कुछ भी अपना नहीं रहता. वह परहित को अपना हित, जनकल्याण में निज कल्याण की प्रतीति करने लगता है. दूसरे शब्दों में मुक्ति का एक अर्थ निष्काम हो जाना भी है. निष्काम होने का अभिप्राय निष्कर्म होना अथवा कर्म से पलायन नहीं है. कर्म करते हुए, सांसारिक कर्मों में अपनी लिप्तता बनाए रखकर भी निष्काम हो जाना सुनने में असंभव और विचित्र-सा लगता है? नादान अकर्मण्यता को ही निष्काम्यता का पर्याय मान लेता है. कुछ लोग निष्काम होने के लिए संन्यास की शरण में जाते रहे हैं. लेकिन देह पर संन्यासी बाना धारण कर वन-वन घूमने से तो सचमुच का वैराग्य संभव नहीं. जब तक मन मोहमाया से ग्रस्त है तब तक कर्मसंन्यास की वास्तविक स्थिति कैसे संभव हो सकती है. इस उलझन को सुलझाने का रास्ता भी गीता मैं है. कृष्ण कहते हैं कि कर्म करो, मगर फल की इच्छा का त्याग कर दो. निष्काम कर्म यानी कर्म करते हुए कर्म का बोध न होने देना, यह प्रतीति बनाए रखना कि मैं तो निमित्तमात्र हूं, कर्ता तो कोई और है, ‘त्वदीयं वस्तु गोविंदम् तुभ्यमेव समप्यते’ भावना के साथ सारे कर्म, समस्त कर्मफलों को ईश्वर-निर्मित मानकर उसी को समर्पित करते चले जाना ही कर्मयोग है. कर्म करते हुए फल की वांछा का त्याग ही विकर्म है, और यह प्रतीति कि मैं तो केवल निमित्तमात्र हूं, जो किया परमात्मा के लिए किया, जो हुआ परमात्मा के इशारे पर उसी के निमित्त हुआ, यह धारणा कर्म को अकर्म की ऊंचाई जक पहुंचा देती है. संसार से भागकर कर्म से पलायन करने की अपेक्षा संसार में रहते हुए कर्मयोग को साधना कठिन है. इसीलिए तो श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि कर्मसंन्यास कर्मयोग की अपेक्षा श्रेष्ठ हो सकता है, तो भी कर्मयोगी होना कर्मसंन्यासी की अपेक्षा विशिष्ट उससे बढ़कर हैः कर्मयोगेश्व कर्मसंन्यासयात् निश्रेयंस कराभुवौ। तयोस्तु कर्मसंन्यासात् कर्मयोगी विशिष्यते।। कर्मयोगी होना तलवार की धार पर चलकर मंजिल को तक पहुंचना है. सांसारिक प्रलोभनों से दूर होने के लिए उससे भाग जाना कर्म-संन्यास में संभव है, मगर कर्मयोगी को तो संसार में रहते हुए ही उसके प्रलोभनों से निस्तार पाना होता है. ऐसे कर्मयोग को साधा कैसे जाए! संसार में रहकर उसके मोह से कैसे दूर रहा जाए, इसके लिए विभिन्न धर्मदर्शनों में अलग-अलग विधान हैं, हालांकि उनका मूलस्वर प्राय एक जैसा है. मुनिगण इसके लिए तत्व-चिंतन में लगे रहते हैं. ऋषिगण मानव-व्यवहार को नियंत्रित और मर्यादित रखने के लिए नूतन विधान गढ़ते रहते हैं. प्राचीन भारतीय मनीषियों द्वारा चार पुरुषार्थों की अभिकल्पना भी इसी के निमित्त की गई है. हिंदू परंपरा के चारों पुरुषार्थ असल जीवन के विभिन्न अर्थों में बहुआयामी सिद्धियों के भी सूचक हैं. धर्मरूपी पुरुषार्थ को साधने का अभिप्राय है, कि हम लोकाचार में पारंगत हो चुके हैं. संसार में रहकर क्या करना चाहिए, और क्या नहीं इस सत्य को जान चुके हैं. और हम जान चुके हैं कि यह समस्त चराचर सृष्टि, भांति-भांति के जीव, वन-वनस्पति एक ही परमचेतना से उपजे हैं. एक ही परम-पिता की संतान होने के कारण हम सब भाई-भाई हैं. ध्यान रहे कि धर्म का मतलब पुरुषार्थ के रूप में सिर्फ परमात्मा तक पहुंचने का, उसको जानने की तैयारी करना अथवा जान लेना ही नहीं है. ये सब बातें अध्यात्म के खाते में आती हैं. तब धर्म क्या है? इस बारे में मनुस्मृति में एक दृष्टांत दिया गया है— धर्म क्या है, यह जानने के लिए ऋषिगण भृगु मुनि के निकट पहुंचे. मुनि के समक्ष अपनी जिज्ञासा रखते हुए उन्होंने कहा— ‘महाराज! हम धर्म जानना चाहते हैं?’ इसपर भृगु जी ने उत्तर दिया— ‘विद्वद्भि सेवितः सद्भिः।’ अर्थात जो अच्छे विद्वान लोग हैं, जो सबके प्रति कल्याण-भाव रखते हैं, वे जो आचरण करते हैं, सेवित करते हैं, उनके द्वारा जो आचरित होता है, वही धर्म है. धर्म की इस परिभाषा में न तो आत्मा है, न ही परमात्मा. दूसरे शब्दों में धर्म नैतिकता और सदाचरण का पर्याय है. भारतीय मेधा को अपने अद्वितीय तत्वचिंतन के कारण विश्वभर में सराहना मिली है. प्रमुख भारतीय दर्शनों न्याय, वैशेषिक, जैन, बौद्ध, चार्वाक, मीमांसा और वेदांत आदि सभी में विद्धान मुनिगण अपनी-अपनी तरह से जीवन और सृष्टि के रहस्यों की पड़ताल करने का प्रयास करते हैं. उनके दर्शन में कल्पना की अद्भुत उड़ान है. इनमें से जैन, बौद्ध और वेदांत दर्शन तात्विक विवेचना के साथ-साथ जीवन को सरल और सुखमय बनाने के लिए व्यावहारिक सिद्धांत भी देते हैं. बौद्ध अष्ठधम्म पद की राह सुझाता है. इसी तथ्य को और सहजता से जानने के लिए एक कहानी का सहारा लिया जा सकता है— एक राजा था. बहुत ही उदार, प्रजावत्सल. सभी का ख्याल रखने वाला. उसके राज्य में अनेक शिल्पकार थे. एक से बढ़कर एक, बेजोड़. राजा ने उन शिल्पकारों की दुर्दशा देखी तो उनके लिए एक बाजार लगाने का प्रयास किया. घोषणा की कि बाजार में संध्याकाल तक जो कलाकृति अनबिकी रह जाएगी, उसको वह स्वयं खरीद लगेगा. राजा का आदेश, बाजार लगने लगा. एक दिन बाजार में एक शिल्पकार लक्ष्मी की ढेर सारी मूर्तियां लेकर पहुंचा. मूर्तियां बेजोड़ थीं. संध्याकाल तक उस शिल्पकार की सारी की सारी मूर्तियां बिक गईं. सिवाय एक के. वह मूर्ति अलक्ष्मी की थी. अब भला अलक्ष्मी की मूर्ति को कौन खरीदता! उस मूर्ति को न तो बिकना था, न बिकी. संध्या समय शिल्पकार उस मूर्ति को लेकर राजा के पास पहुंचा. मंत्री राजा के पास था. उसने सलाह दी कि राजा उस मूर्ति को खरीदने से इनकार कर दें. अलक्ष्मी की मूर्ति देखकर लक्ष्मीजी नाराज हो सकती हैं. लेकिन राजा अपने वचन से बंधा था. ‘मैंने हाट में संध्याकाल तक अनबिकी वस्तुओं को खरीदने का वचन दिया है. अपने वचन का पालन करना मेरा धर्म है. मैं इस मूर्ति को खरीदने से मना कर अपने धर्म से नहीं डिग सकता.’ और राजा ने वह मूर्ति खरीद ली. दिन भर के कार्यों से निवृत्त होकर राजा सोने चला तो एक स्त्री की आवाज सुनकर चैंक पड़ा. राजा अपने महल के दरवाजे पर पहुंचा. देखा तो एक बेशकीमती वस्त्र, रत्नाभूषण से सुसज्जित स्त्री रो रही है. राजा ने रोने का कारण पूछा. ‘मैं लक्ष्मी हूं. वर्षों से आपके राजमहल में रहती आई हूं. आज आपने अलक्ष्मी की मूर्ति लाकर मेरा अपमान किया. आप उसको अभी इस महल से बाहर निकालें.’ ‘देवि, मैंने वचन दिया है कि संध्याकाल तक तो भी कलाकृति अनबिकी रह जाएगी, उसको मैं खरीद लूंगा.’ ‘उस कलाकार को मूर्ति का दाम देकर आपने अपने वचन की रक्षा कर ली है, अब तो आप इस मूर्ति को फेंक सकते हैं!’ ‘नहीं देवि, अपने राज्य के शिल्पकारों की कला का सम्मान करना भी मेरा धर्म है, मैं इस मूर्ति को नहीं फेंक सकता.’ ‘तो ठीक है, अपने अपना धर्म निभाइए. मैं जा रही हूं.’ राजा की बात सुनकर लक्ष्मी बोली और वहां से प्रस्थान कर गई. राजा अपने शयनकक्ष की ओर जाने के लिए मुड़ा. तभी पीछे से आहट हुई. राजा ने मुड़कर देखा, दुग्ध-धवल वस्त्राभूषण धारण किए एक दिव्य आकृति सामने उपस्थित थी. ‘आप?’ राजा ने प्रश्न किया. ‘मैं नारायण हूं. राजन आपने मेरी पत्नी लक्ष्मी का अपमान किया है. मैं उनके बगैर नहीं रह सकता. आप अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें.’ ‘मैं अपने धर्म से बंधा हूं देव.’ राजा ने विनम्र होकर कहा. ‘तब तो मुझे भी जाना ही होगा.’ कहकर नारायण भी वहां से जाने लगे. राजा फिर अपने शयनकक्ष में जाने को मुड़ा. तभी एक और दिव्य आकृति पर उसकी निगाह पड़ी. कदम ठिठक गए. ‘आप भी इस महल को छोड़कर जाना चाहते हैं, जो चले जाइए, लेकिन मैं अपने धर्म से पीछे नहीं हट सकता.’ यह सुनकर वह दिव्य आकृति मुस्कराई, बोली—‘मैं तो धर्मराज हूं. मैं भला आपको छोड़कर कैसे जा सकता हूं. मैं तो नारायण को विदा करने आया था.’ उसी रात राजा ने सपना देखा. सपने में नारायण और लक्ष्मी दोनों ही थे. हाथ जोड़कर क्षमायाचना करते हुए— ‘राजन हमसे भूल हुई है, जहां धर्म है, वहीं हमारा ठिकाना है. हम वापस लौट रहे हैं.’ और सचमुच अगली सुबह राजा जब अपने मंदिर में पहुंचा तो वहां नारायण और नारायणी दोनों ही थे. आप ऐसी कथाओं पर चाहें विश्वास न करें. परंतु इस तरह की कथाएं रची जाती रही हैं, ताकि मनुष्य अपने कर्तव्यपथ से, नैतिकता से बंधा रहे. धर्म और अध्यात्म का घालमेल कुछ धार्मिक कूप-मंडूकता और स्वार्थी राजनेताओं के छल का परिणाम है. वास्तव में तो धर्म उन जीवनमूल्यों में आस्था और उनका अभिधारण है, जिनके अभाव में यह समाज चल ही नहीं सकता. जिनकी उपस्थिति उसके स्थायित्व के लिए अनिवार्य है. विभिन्न समाजों की आध्यात्मिक मान्यताओं, उनकी पूजा पद्धतियों में अंतर हो सकता है, मगर उनके जीवनमूल्य प्रायः एकसमान और अपरिवर्तनीय होते हैं. जब हम धर्म की बात करते हैं और यह मान लेते हैं कि हमें संसार में रहकर अध्यात्म को साधना है तो मामला नैतिकता पर आकर टिक जाता है. नैतिकता बड़ी ऊंची चीज है. यह कर्मयोगी को राह दिखाती है, कर्मसंन्यासी का पथ-प्रशस्त करती है. नैतिक होना मनसा, वाचा कर्मणा पवित्र होना भी है. आचरण की पवितत्रता, मन की पवित्रता और देह की पवित्रता ही मानवधर्म है. यहां जब हम देह की बात करते हैं तो उसके पीछे उसका पूरा परिवेश स्वतः ही समाहित हो जाता है. मनुष्य बौद्ध धर्म में इसे अष्ठधर्म के सिद्धांत के आधार पर समझाया गया है. दूसरा हिंदू पुरुषार्थ है, अर्थ. संसार में जीने के लिए, सामाजिकता को बनाए रखने के लिए, आपसी व्यवहार को सुसंगत रूप में चलाने के लिए धन अत्यावश्यक है. वह जीवन-व्यवहार को सहज और सुगम बनाता है. जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन की महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. यह सामाजिक प्रतिष्ठा का मूल है. मगर यहां एक पेंच है. धन को पुरुषार्थ मान लेने का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी तरीके से अर्जित किया गया धन पुरुषार्थ है. या धन है तो उसका हर उपयोग सामाजिक-धार्मिक दृष्टि से मान्य है. चोरी, डकैती, वेश्यावृति और जुआ जैसे दुव्र्यसनों से अर्जित धन को समाज में हेय माना गया है. यहां तक कि उसका तिरष्कार भी किया जाता है. मनुष्यता के उत्थान के लिए साध्य और साधन दोनों की पवित्रता जरूरी है. अत्यधिक धन अर्जित कर लेना, दूसरे के हिस्से का धन हड़प लेना भी पुरुषार्थ नहीं है. धन के पुरुषार्थ मानने का अभिप्राय उससे जुड़े समूचे व्यवहार के मानवीकरण से है. अस्तेय और अपरिग्रह जैसी शास्त्रीय व्यवस्थाएं धर्नाजन और उससे जुड़े प्रत्येक व्यवहार को मानवीय बनाए रखने के लिए की गई हैं. जिसका अभिप्राय है कि चोरी-डकैती अथवा लोकमान्य विधियों से अलग ढंग से अर्जित किया गया धन पाप है. धन उतना ही होना चाहिए जितना कि गृहस्थ जीवन को सुगम बनाए रखने के लिए आवश्यक है. कबीर ने धनार्जन को लेकर बहुत अर्थपूर्ण बात कही है— साधु इतना दीजिए जामे कुटुंब समाय, मैं भी भूखा न रहूं, साधू न भूखा जाए. धन का अपव्यय आलोचना का विषय है तो उसे व्यय करने के लिए समझदारी की जरूरत पड़ती है. वृथा आडंबरों, लोक-दिखावे, कोरी प्रतिष्ठा, जुआ एवं शराबखोरी जैसे दुव्र्यसनों पर खर्च करने के पुरुषार्थ-सिद्धि असंभव है. दूसरे शब्दों में धन को पुरुषार्थ की गरिमा से विभूषित करना, तत्संबंधी प्रत्येक व्यवहार को मानवीय रूप प्रदान करना है. इस तरह सिर्फ लोकमान्य विधि से अर्जित धन को लोकमान्य तरीकों से खर्च करने में ही में पुरुषार्थ-सिद्धि संभव है. //\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\//\\
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भारत देश को सनातन धर्म वाला देश कहा जाता रहा है । यहां पर पुरातन काल में चार वेद ओरअट्ठारह पुराण लिखे गये थे । जिनमें लिखी गयी बातें ओर कथन आज के युग में भी उतनी ही प्रासंगिक है । मैनें यहां पर चारों वेद ओर सभी पुराणों का संकलन देख़ा । आप भी पठिये यासुनियें । |
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