भारत के ३ रे प्रधानमँत्री ,स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी
जिनका जन्म हुआ था अक्टूबर - २ , १९०४ को और उन्होँने देहत्याग किया जनवरी - ११ , १९६६ को !
उनका जन्म हुआ मुग़ल सराय , उत्तर प्रदेश में !उनके पिताजी का नाम था श्री शारदा प्रसाद जी!
माता पिता प्यार से उन्हें 'नन्हे ' कहकर ही पुकारतेथे ये प्रार्थना वे हमेशा करते :
" हे नानक ! मैं कुश ( घास ) की तरह लघु हो जाऊं , क्यूंकि दुसरे पौधे , नष्ट हो जायेंगे परन्तु, कुश हमेशा हराभरा रहेगा "
लाल बहादुरजी के पिता जब वे डेढ़ सालके थे, चल बसे! वे जब शिशु ही थे तब एक दिन उनकी माता के हाथोँ से नदी मेँ गिर पडे और किसी गौपालक के हाथोँ मेँ जा गिरे - अब वह ग्वाला सँतान के लिये तरस रहा था उसने इसे देव का वरदान मान लिया और वो उन्हेँ अपने घर ले आया ! लाल बहादुर जी के माता पिता ने अखबार मेँ खबर छपवाई और उस ग्वाले को ये बात का पता चला तब उसका ह्र्दय पसीजा और उसने बालक को थाने जा कर लौटा दिया और तब वे पुन: अपने घर पहुँचे थे।ये घटना अपने आप मेँ अजीब सी है। 
माता रामदुलारी देवी ने २ बड़ी बहनों के संग लाल बहादुर को ले , ननिहाल में आसरा लिया।
नाना जी हजारीलाल जी के घर लाल बहादुर जी १० साल तक रहे। आगे की पढाई के लिए मामाजी के घर वाराणसी भेज दिए गए।हरिस्चन्द्र हाई स्कुल मेँ, पढाई करते रहे और उसी अर्से एक बार दोस्तोँ के सँग, गँगा पार, मेला देखने पहुँचे। धारा मेँ पानी उफान पर था और लौटकर पार आने के लिये नाविक को देने के लिये गाँठ मेँ अधेला भी नहीँ था !
अब क्या हो ?स्वाभिमानी लाल बहादुर ने, नदी मेँ छलाँग लगा दी और तैर कर नदी पार कर वे घर पहुँचे थे। 
काशी विध्यापीठ मेँ भी शिक्शा ली --१९२७ , शास्त्री जी का विवाह मिर्झापुर की कन्या " ललिता देवी " के सँग हुआ
दहेज की प्रथा का प्रचलन , उस समय एक आम बात थी ऐसे समय मेँ अपनी सज्जनता की मिसाल देते हुए, लाल बहादुर जी ने सिर्फ एक चरखा और खादी की कुछ लडेँ ही उपहार स्वरुप स्वीकार कीँ थीँ। केन्द्रीय कानून मँत्रालय मेँ ,१९५२ , रेल मँत्रालय मेँ १९५२ -५६ , और व्यापार वाणिज्य मँत्री रहे १९५७ -६१ और गृह मँत्रालय मेँ , १९६१ -६३ रहे जब अचानक श्री जवाहरलाल नेहरू का १९६४ में निधन हो गया !
मई २७, १९६४ का दिन, भारत के लिये एक भयँकर आघात बनकर उपस्थित हुआ जब प्रधानमँत्री के पद पर आरुढ जवाहर लाल जीदोपहर को चल बसे !
आकाशवाणी के दिल्ली के वरिष्ठ कार्यालय मेँ मानोँ सभी को साँप सूँघ गया हो और काटो तो खून भी न निकले ऐसी परिस्थिती मेँ आम कर्मचारी बौखलाया हुआ, गभराया हुआ, सँज्ञाशून्य सा हो गया था !कई अधिकारी सहमे हुए, ये अँतराष्ट्रीय स्तर के समाचार को, जाहीर करने से सकपका रहे थे और समाचार प्रसारित करते ही पहले पूरा भारत और फिर विश्व के सभी हिस्सोँ मेँ शोक की लहर दौड गई थी साथ ही १९६२ की चीनी हमले की अपमान की याद भी कहीँ दब गई थी।उसके बाद के समय मेँ, भारत मेँ अन्न का अभाव उभर कर सामाने आया था। बँगलूर से लुधियाना तक लोगोँ के असँतोष की अग्नि बाहर आकर भडकती दीखलाई देने लगी थी.......पँडित नेहरु के शाशन काल मेँ कृषि पर ध्यान नहीँ दिया गया था बल्कि उध्योग और बँध बाँधने मेँ , पँचवर्षीय योजनाएँ चल रहीँ थीँ कुछ सफल हुईँ थीँ कुछ नहीँ।
कश्मीर और कच्छ के रण पर पाकिस्तानी सेना दस्तक दे रही थी युध्ध आया , अभी आया ...जिससे असँतोष, असहजता, व्याप्त थी। ऐशिया के अन्य महत्त्वपूर्ण देशोँ मेँ फिर भी भारत अपनी अलग पहचान बना रहा था इतिहास को रच रहा था, गढ रहा था। जिस के पीछे एक नन्ही शक्ति खडी थी द्रढता से भारत के प्रधान मँत्री पद की बागडोर सम्हाले हुए थे श्री लाल बहादुर शास्त्री जी !
सज्जनता की शर्म ओढे , गुलाब का फूल सुफेद झक्क अचकन मेँ खोँसे, सुन्दर लँबे नेहरु जी के स्थान पर ,
छोटे सिर्फ कद से, परँतु अपने चारित्र्य के बल से ऊँचे, इस सीधे सरल इन्सान पर भारत की जनता की आस बँधी हुई थी। शास्त्री जी ने जनता से अपील की थी कि एक वक्त का भोजन छोड देँ और किसी जरुरतमँद इन्सान को भोजन खिलायेँ - " जय जवान, जय किसान " का नारा भी उन्होँने बुलँद किया था।
भारतीय सेना के २ दस्तोँ को पाकिस्तान के पास कच्छ की सीमा पे भेजा तो लोगोँ को उनके साहस का परिचय हो गया।
कैरो, मोस्को, युगोस्लाविया, बेलग्रेड और ओटावा की विदेश यात्राओँ से भारतीय शाँति का सँदेश लाल बहादुर जी ने पहुँचाया तो भारतीय आवाम ने उन्हेँ आदर दिया। स्वदेश लौटे तो १६ प्राँतोँ के मुख्य मँत्रियोँ को बुलाकर खाध्यान्न के वितरण के लिये "रेशन -कार्ड " व्यव्स्था की शुरुआत करवायी। 
पाकिस्तान के साथ युध्ध विराम की घोषणा के बाद, जनरल अय्युब खाँ से शिखर मँत्रणा के लिये तब शास्त्री जी ताशकँद के लिये रवाना हुए। ताशकँद इस वक्त उझ्बेकिस्तान का हिस्सा है पर पहले वो सोवियत सँघ का भाग रहा था।
सोवियत प्रमुख कोसीजीन के आग्रह पे ताशकँद करार पर लाल बहादुर शास्त्री व अय्युब खाँ ने , १० जनवरी १९६६ के दिन हस्ताक्षर किये -दूसरे दिन १-३२ मिनट पर ह्र्दय गति रुक जाने के कारण शास्त्री जी का देहाँत हो गया !
आजतक कईयोँ का विश्वास है कि उनके अकाल मृत्यु के पीछे कोई साजिश थी - अब उसका कोई सबूत तो नहीँ है पर इस तरह बहुत कम देश के प्रमुख का परदेस मेँ निधन हुआ है - इसलिये ये प्रसँग आज भी अवास्तविक लगता है। 
भारत के इस सच्चे सपूत की समाधि " विजय -घाट" दिल्ली मेँ बनी हुई है और भारत ~ रत्न से लाल बहादुर शास्त्री जी को देशने सम्मान दिया है। आँध्र प्रदेश का क्रीडाँगण "लाल बहादुर स्टेडीयम" कहलाता है।
भारत के लाल की कमी सबसे ज्यादा खली उनकी धर्मपत्नी श्रीमती ललिता देवी की बडी सी सिँदूरी बिँदिया की कमी से ! उनके भाल पर , सिँदूरी बिँदिया की गैरहाजरी से ! 
भारत के प्रधान मँत्री पद पे फिर एक बार श्री गुलजारीलाल नँदा आये और भारत की स्वतँत्रता की यात्रा चलती रही ~~~स्वर साम्राज्ञी लता मँगेशकर जी ने ललिता जी के लिखे कुछ भजन व गीतोँ को अपना स्वर देकर इस दँपत्ति को अपनी श्रध्धा से सन्मान दिया है -ये भजन प्रस्तुत है। शब्द यहाँ है -
अगर किसी के पास ये गीत हो तो अवश्य सुनवायेँ । 
नॉन - फ़िल्म / गायिका : लता मंगेशकर / संगीत : श्री चित्रगुप्त जी :
लेखिका : श्रीमती . ललिता शास्त्रीजी / : १९६४ :
(बता दे कोई मोहे श्याम की डगरिया) - २
श्याम की डगरिया मोरे राम की डगरिया बता दे कोई मोहे श्याम की ...डगरिया....
कहाँ मैं ढोओँढ़ोओँ सीता रमन को कैसे मैं पाऔँ श्याम
सुन्दर को बता दे कोई श्याम से मिलने की जतनिया
बता दे कोई मोहे श्याम की डगरिया -२
श्याम सुन्दर की मोहनी मूरतराम-कृष्ण की सावली सूरत -२ दिखा दे कोई दोनों की मोहनी मूरतियाँ
बता दे कोई मोहे श्याम की डगरिया -२
निस दिन तरसत नैन हमारेकैसे मिलेंगे मोहे राम पिया रे -२ दिखा दे कोई ललिथ को श्याम कि नगरिया
बता दे कोई मोहे श्याम की डगरिया -२
श्याम की डगरिया मोरे राम की डगरियाबता दे कोई मोहे श्याम की डगरिया.

 
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